अड़तीसवां दिन : इंसान को कमजोर करता है अहंकार – मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantचिंतन, मौन साधना

मुनि पूज्य सागर की डायरी से

मौन साधना का 38वां दिन। इंसान को उसका अहंकार कमजोर कर देता है। अहंकार में इंसान यह भूल जाता है कि पुण्य के फल से उससे भी अधिक सम्पन्नशाली, शक्तिशाली,सुखी, गुणी भी और कोई हो सकता है। अहंकारी व्यक्ति की बुद्धि, मन और मस्तिष्क गुणों के विकास की बजाए विनाश की और चलती चली जाती है। उसे अपनी गलती भी दिखाई नहीं देती है। बल्कि वह अपने आपको और अपने कार्य को ही सबसे अधिक श्रेष्ठ मानता है। इंसान के अंदर अहंकार नकारात्मक सोच और जीवन में अधार्मिक भावना से आना  शुरू होता है। वह अपना इतिहास भूल जाता है कि जब उसका जन्म हुआ था, तब उसके पास क्या था और अब क्या है?

वास्तविकता तो यह है कि यह सब जो परिवर्तन हुआ है, यह सब पुण्य-पाप कर्म की देन है, पर अहंकार इंसान को इसका एहसास भी नहीं होने देता है। जब अहसास होना शुरू होता हैं तब तक उसके पास जो अच्छा होता है, उसका नाश होना प्रारम्भ हो जाता है। हम सबके सोचने का विषय यह है कि क्या सबकी स्थिति हर समय एक जैसी होती है? रावण इतना धर्मात्मा, बुद्धिवान,तपस्वी और शक्तिशाली था कि उसका शब्दों मैं वर्णन नहीं कर सकते हैं। पर क्या हुआ? उसकी स्थिति बदली और धीरे- धीरे उसकी अच्छाई आदि का नाश होना शुरू हो गया। तब उसे अपनी गलतियों का अहसास होने भी लगा, पर अहंकार इतना हावी हो गया था कि वह अंदर से अपनी गलतियों को स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था। वह अंदर ही अंदर अहंकार के लावे में धंसता ही चला गया और अपना मान, सम्मान,बुद्धि,ज्ञान,शक्ति,वैभव समाप्त करता चला गया और अंत में मृत्यु को प्राप्त हो गया।

शनिवार, 11 सितम्बर, 2021 भीलूड़ा

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