आज हम पाठशाला में शल्य की बात करेंगे । तो आप शल्य को जानते हैं ।– अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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jaaniye shalya ke baare me

जो काँटे की तरह अंदर ही चुभता हैं उसे शल्य कहते हैं । मनोविज्ञान की भाषा में मनुष्य की आंतरिक कुंठा और ग्रंथियों को शल्य कह सकते हैं । शल्य तीन प्रकार का होता है ।

माया शल्य – आत्मवंचना पूर्वक तपश्चरण/व्रताचरण करना माया शल्य है ।
मिथ्या शल्य – सम्यग्दर्शन से विरहित धार्मिक प्रवृत्ति मिथ्या शल्य है ।
निदान शल्य – भावी भोगों की आकांक्षा से व्रताचरण/तपश्चरण करना,उससे दत्तचित्त रहना निदान शल्य है ।
शल्य मनुष्य के मनमें आकुलता,तनाव कुंठा उत्पन्न करता है । नि:शल्य मनुष्य का व्रताचरण ही यथार्थ होता है । अतः इन तीनों शल्यों से रहित होकर ही व्रताचरण करना चाहिए ।

अनंत सागर
पाठशाला (इक्यावनवां भाग)
17 अप्रैल,शनिवार 2021
भीलूड़ा (राज.)

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