जैन धर्म के अनुसार रक्षा बँधन क्यों? – अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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प्रतिवर्ष श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को रक्षाबंधन अत्यंत प्राचीन पर्व है। इसकी परम्परा अठारहवें तीर्थंकर अरहनाथ के तीर्थ से महामुनि विष्णुकुमार के निमित्त से प्रारंभ हुई है। इस पर्व की पौराणिक कथा इस प्रकार है…

उज्जैनी नगरी में राजा श्रीवर्मा राज्य करते थे उनके बलि, नामुचि, बृहस्पति और प्रह्लाद आदि चार मंत्री थे। उनको धर्म पर श्रद्धा नहीं थी। एक बार उस नगरी में आचार्य श्री अकम्पन जी महाराज का ७०० मुनियों के संघ सहित का आगमन हुआ। राजा भी उनके मंत्री के साथ गए और मुनियों को वंदन किया। मुनि तो ध्यान में लीन मौन थे। राजा उनकी शांति और तप को देखकर बहुत प्रभावित हुआ, पर मंत्री कहने लगे -‘महाराज ! इन जैन मुनियों को कोई ज्ञान नहीं है इसीलिए मौन रहने का ढोंग कर रहे हैं’ इस प्रकार निंदा करते हुए राजा और मंत्री वापस आ रहे थे। तभी यह बात श्री श्रुतसागर जी नाम के मुनिश्री ने सुन ली , उन्हें मुनि संघ की निंदा सहन नहीं हुई इसलिए उन्होंने मंत्रियों के साथ वाद-विवाद किया और उन्हें चुप कर दिया।

राजा के सामने अपमान जानकार वह मंत्री रात में मुनि को मारने गए, पर जैसे ही उन्होंने तलवार उठाई उनका हाथ खड़ा ही रह गया। नगर देवी ने उन सबको उसी अवस्था में कील(जड़) कर दिया।  सुबह सब लोगों ने देखा और राजा ने उन्हें राज्य से बाहर कर दिया।

यहाँ से निकाले गए ये चार मंत्री हस्तिनापुर के राजा पद्मराय की शरण में गए। पद्मराय के भाई जैन मुनि थे – उनका नाम विष्णु कुमार था।  हस्तिनापुर के राजा का शत्रु सिंहरथ नाम का राजा था, जिस पर पद्मराय राजा जीत हासिल ही नहीं कर पा रहे थे। तब बलि मंत्री की युक्ति से उन्हें विजय प्राप्त हुई और उन्होंने मंत्री से इनाम माँगने को कहा, पर मंत्री ने कहा – जब आवश्यकता पड़ेगी तब माँग लूँगा। इधर आचार्य श्रीअकम्पन जी महाराज ७०० मुनियों के संघ सहित विहार करते हुए हस्तिनापुर पहुँचे। उनको देखकर मंत्रियों का बैर जागा और उन्होंने उन्हें मारने की योजना बनायी।
मौका पाते ही बलि ने राजा से अपना ईनाम माँग लिया…

मंत्री ने कहा – ‘महाराज हमें यज्ञ करना है इसलिए आप हमें सात दिन के लिए राज्य सौप दें। राजा ने वचनबद्धता के कारण राज्य सौंप दिया। चारों मंत्रियों ने मुनि संघ के चारों ओर पशु, हड्डी, मांस, चमड़ी के ढेर लगा दिए फिर और उसमें आग लगा दी। मुनिवरों पर घोर उपसर्ग हुआ। बलि के अत्याचार से सब जगह हा-हाकार मच गया था और लोगों ने यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि जब मुनियों का संकट दूर होगा तो उन्हें आहार कराकर ही भोजन ग्रहण करेंगे।
यह बात विष्णुकुमार मुनि को पता चली। वह हस्तिनापुर गए और एक ब्राह्मण पंडित का रूप धारण कर लिया और बलि राजा के सामने उत्तमोत्तम श्लोक बोलने लगे। बलि राजा पंडित से बहुत खुश हुआ और इच्छित वर माँगने को कहा-विष्णुकुमार ने तीन पग जमीन माँगी। विष्णुकुमार ने विराट रूप धारण किया और एक पग सुमेरु पर्वत पर रखा और दूसरा मानुषोत्तर पर्वत पर रखा और बलि राजा से कहा – ‘बोल अब तीसरा पग कहा रखूँ ?’

तीसरा पग रखने की जगह दे नहीं तो तेरे सिर पर रखकर तुझे पाताल में उतार दूँगा’। चारो और खलबली मच गयी। देवों और मनुष्यों ने विष्णुकुमार मुनि को विक्रिया समेटने के लिए कहा- राजा बने बलि सहित चारों मंत्रियों ने भी क्षमा माँगी। विष्णुकुमार मुनि ने मुनिसंघ पर किए गए उपसर्ग को दूर करवाया और अहिंसा पूर्वक धर्म का स्वरूप समझाया। इस प्रकार ७०० जैन मुनियों की रक्षा हुई।
हजारों श्रावक ने ७०० मुनियों की वैयावृति की और बलि आदि मंत्री ने मुनिराजों से क्षमा माँगी। जिस दिन यह घटना घटी, वह श्रावण सुदी पूर्णिमा थी । इस दिन ७०० मुनियों का उपसर्ग दूर हुआ और उनकी रक्षा हुई , अतः वह दिन रक्षा पर्व के नाम से प्रसिद्ध हुआ। संकट दूर होने पर सब लोगों ने दूध की सेवियों का हल्का भोजन तैयार किया क्योंकि मुनि कई दिन के उपवासे थे। मुनि केवल सात सौ थे अतः वे केवल सात सौ घरों पर ही आहार ले सकते थे। इसलिए शेष घरों में उनकी प्रतिकृति बनाकर और उसे आहार देकर प्रतिज्ञा पूरी की गई। सबने परस्पर में रक्षा करने का बंधन बांधा, जिसकी स्वीकृति त्यौहार के रूप में अब तक चली आ रही है। दीवारों पर जो चित्र रचना इस दिन की जाती है, उसे सौन कहा जाता है। यह सौन शब्द श्रमण शब्द का अपभ्रंश माना गया है। श्रमण शब्द प्राचीन काल में जैन साधु का सूचक था। वास्तव में कर्मों से न बंधकर मूल स्वरूप की रक्षा करना ही ‘रक्षा-बंधन ‘ है।

विष्णुकुमार मुनि ने बंधन को अपनाया। अपने पद को छोड़कर मुनियों की रक्षार्थ गए। ऐसा करने में उनका प्रयोजन धर्म प्रभावना और वात्सल्य था। रक्षा के लिए जो बंधन है, वह सभी के लिए मुक्ति का कारण है। बाहर से मधुर और भीतर से कटाक्ष, ऐसा रक्षा बंधन नहीं होना चाहिए। हमारे द्वारा सम्पादित कार्य बाहर और भीतर से एक समान होना चाहिए। रक्षा बंधन को सच्चे अर्थों में मनाना है तो बाहर और भीतर से एक समान हो। मन में करूणा का भाव जागृत करें, अनुकम्पा, दया और वात्सल्य का अवलम्बन लें… तभी यह सार्थक होगा। रक्षा बंधन पर हममें जो करूणाभाव है वह तन-मन धन से अभिव्यक्त हो। यह एक दिन के लिए नहीं, सदैव के लिए हमारा स्वभाव बन जाय, ऐसी भावना भाना चाहिए। सत्वेषु मैत्री-प्राणी मात्र के प्रति मित्रता का भाव हमारे जीवन में उतरना चाहिए। तभी हमारा यह पर्व मनाना सार्थक है।

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