जीवन की जीवनी है उर्जा है आध्यात्म

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अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

प्रकरण १

घर के झगड़ों का तनाव झेला ना गया, आत्महत्या कर ली।

प्रकरण २-

परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण ना हो सके, आत्महत्या कर ली।

प्रकरण ३-

व्यापार में नुकसान लग गया, कर्ज पाट ना सके, हार कर आत्महत्या कर ली।

प्रकरण ४-

प्रेम प्रसंग में सफलता नहीं मिली। परिजन शादी के लिए तैयार नहीं हुए। या फिर किसी तरह का धोखा हो गया… निराशा से घिरकर आत्महत्या कर ली।

आत्महत्या एक जघन्य अपराध न होकर आज हर समस्या का हल बनता जा रहा है। विडंबना ही है कि अधिकांश लोग परिस्थिति से लडऩे के बजाय समस्या के आगे घुटने टेककर आत्महत्या का रास्ता अपना रहे हैं सिर्पस मानसिक और भावनात्मक दृढ़ता के अभाव एवं अपनी संकीर्ण सोच के कारण। जानते हैं इसके पीछे मूल वजह क्या है? जीवन में आध्यात्म की कमी। जी हाँ आध्यात्म ही है जो जीवन में मानसिक और भावनात्मक दृढ़ता प्रदान करता है। यही वह शक्ति है जो जीवन में आने वाले हर उतार-चढ़ाव और मन के हर भाव जैसे सुख-दु:ख, मैत्री-बैर, करूणा-तिरस्कार, क्रोध-क्षमा, हार-जीत, सफलता-असफलता आदि में भावनात्मक संतुलन बनाए रखती है। प्राचीन काल में भारतीय संस्कृति में आध्यात्म जीवन का अभिन्न अंग था विंसतु वर्तमान समय में इसका स्थान नगण्य है और इसी कारण हम हमारे चारों और नकारात्मकता और अराजकता का तांड़व देख रहे हैं। हमें पुन: हमारी भारतीय आध्यात्मिक जीवन शैली की ओर लौटकर आध्यात्म की जीवनी ऊर्जा से परिपूर्ण होना होगा।

प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह आध्यात्म क्या है? आध्यात्म यानि आत्मस्थ भाव में जीना। निर्लिप्तता के साथ दृष्टा भाव से जीवन जीना। अवचेतन मन की चेतन शक्ति को प्रकट करना ही आध्यात्म है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ सहज भाव से करने वाला व्यक्ति जब आध्यात्म के साथ सुख, शांति और समृद्धि को प्राप्त करता है तो जीवन में किसी भी तरह के तनाव, अवसाद से घिरने पर वह कभी भी आत्महत्या जैसे जघन्य कृत्य को करने की नहीं सोचता है। हर परिस्थिति का तटस्थ भाव के साथ सामना करके उस परिणाम को स्वीकार करता है। चारों पुरुषार्थों को करने वाला अपने जीवन में संतुलन बनाए रखता है। अच्छे-बुरे की पहचान करना उसे आ जाता है। शनै: शनै: वह आध्यात्म की ओर बढ़ता है। जीवन में आध्यात्म धारण करने वाले का आचरण, विचार, रहन-सहन, खान-पान शुद्ध होता है और वह जीवन के हर कार्य में संतुलन बनाए रखता है। अध्यात्म जियो और जीने दो की कला सिखाता है। सहज सरल स्वभाव और क्षमा के गुण को जाग्रत करता है। हर संकट को सहज भाव में लेने की कला सिखाता है। संकट और पाप के कारण जो अशुभ कर्म आते हैं उसमें हमें यह सोचने की शक्ति देता है कि जो हो रहा है वह मेरे ही कर्मों का फल है।

आज अमीर अधिक पैसों के कारण तो गरीब अपनी तंगहाली पर परेशान है सदा असंतोष के कारण दोनों के मन अवसाद से ही भरे रहते हैं एक को पैसा खोने का डर तो दूसरे को पैसा न होने का मलाल बस इसी के बीच महत्वाकांक्षा जन्म लेती है और अमीर और अधिक पैसा कमाने व गरीब अचानक मालामाल बनने की सोचने लगता है। ऐसे में ही अराजकता और भ्रष्टाचार की व्युत्पत्ति होती है। यदि प्राचीन काल की तरह हमारी जीवन शैली में भी आध्यात्म का स्थान होता तो व्यक्ति अपनी स्थिति में संतोष के साथ जीता वह अर्थ का महत्व केवल जीवन निर्वाह उपयोगी ही समझता तो धर्म के साथ अर्थोपार्जन कर काम और फिर मोक्ष हेतु पुरुषार्थ करता। आज स्थिति उलट है। पैसा ही सबकुछ है चाहे वह वैससे भी आया हो इसके बाद आता है भोग यानि काम, धर्म और मोक्ष तो युवा पीढ़ी के लिए वह शब्द हैं जिसके मायने केवल बुजुर्गों के लिए है। आज बचपन से ही कोई भी अपने बच्चे को शिक्षा के साथ आध्यात्मिकता का पाठ नहीं पढ़ाता। सब यही सोचते हैं अभी स्वूसली शिक्षा पर ध्यान दो ताकि आगे अच्छे कॉलेज में प्रवेश मिले और बेहतरीन प्रोपेसशनल पाठ्यक्रम में महारथ हासिल कर वह अच्छे वेतन के साथ नौकरी पा ले या अपना स्वयं का व्यापार कुशलता से कर धनोपार्जन करे। हमने ही हमारी सोच से धर्म और मोक्ष के पुरुषार्थिक महत्व को अलग कर दिया है। यदि आज कोई युवा गलती से भी आध्यात्मिक सोच लिए जीवन जीता है तो उसे निरीह बेववूसफ समझा जाता है। अल्प में संतोष करता है तो उसे प्रमादवादी कहा जाता है कि अपनी नाकाबिलियत को छुपाने के लिए उसने धर्म और आध्यात्म का चोगा पहन रखा है जबकि सत्य इसके विपरित है। वह पुरूष ही सही मायने में पुरुषार्थी है जो इन चारों में संतुलन बना धर्म संगत कार्य करे। हम बच्चे को पैसा कमाने की मशीन बनाने की होड़ में उसे अच्छा इंसान बनाना भूल रहे है और इन्हीं सब के कारण आ रही है मानसिक और भावनात्मक दुर्बलता, जरा सी असफलता तो व्यक्ति के वजूद को ही हिला देती है और वह बरबस ही आत्महत्या को गले लगाकर अपने इस भव को तो बिगाड़ता ही है साथ ही परभव और अगले जीवन को भी कष्टमय बना देता है।

आध्यात्म की कमी के कारण आज सोच बहुत संकीर्ण हो गई है। अहंकार, ईष्र्या और क्रोध के भाव क्षण-क्षण में मन में जाग्रत हो उठते हैं। संयम का गुण तो नजर ही नहीं आता है। अपनी उम्र से अधिक सोचना और उसके मान से अधिक कार्य करना। इसमें असफलता की आशंका अधिक होती है और फिर अपने ही दूसरे साथी से तुलना जीवन में ईष्र्या को इस तरह जन्म देती है कि वह ईष्र्या जीवन के सुख को ही लील लेती है। उसकी कार्यप्रणाली और सोच सिर्पस आर्थिक सफलता के ईर्द-गिर्द ही घूमती है। यही कारण है कि आज जरूरी है बच्चों को पौराणिक संस्कृति की शिक्षा पद्धति के समान प्रारंभ से ही आध्यात्म की ओर प्रेरित कर उन्हें धर्मसंगत जीवन जीने की कला सिखाने की। आत्मा का मूल गुण संतुष्टि है और वह अंतर्मुखी है आध्यात्म आत्मा से संबंध स्थापित करवाता है और जब आत्मा के साथ संपर्वस होगा तो व्यक्ति बर्हिमुखी नहीं होगा। बाहरी चकाचौंध का आकर्षण उसे और उसके आचरण को दूषित नहीं करेगा। उसका मन और मस्तिष्क दृढ़ होंगे और किसी भी असफलता से क्षुब्ध होकर वह आत्महत्या जैसे महापाप को करने के बारे में सोचेगा भी नहीं।

अब प्रश्न उठता है आध्यात्म का जीवन में समावेश हो तो वैससे हो? यह अत्यंत सरल है ध्यान को अपने जीवन में स्थान देकर, धर्म को जीवन में शामिल करके मोक्ष की चाहना के साथ हर पुरुषार्थ दृष्टा भाव के साथ करके ही आध्यात्म का समावेश होता है। जो जैसा है उसमें संतुष्ट रहकर। दु:ख में दु:खी हुए बिना और सुख में सुखी हुए बिना यानि हर भाव में सहज रहकर ही आध्यात्म की ओर कदम बढ़ाया जा सकता है। आध्यात्मिक जीवन पाना आसान नहीं है पर दुष्कर भी नहीं, मन में ईश्वर के प्रति सच्चा समर्पण हो और अगाध श्रद्धा हो तो सही मार्गदर्शक के रूप में सच्चा गुरु भी प्राप्त हो ही जाता है। सच्चे गुरु की बताई राह पर चलकर आध्यात्म की ओर अग्रसर रहते हुए मोक्षलक्ष्मी को प्राप्त करने का पुरुषार्थ करते हुए जीवन निर्वाह के लिए अर्थ और संतति उत्तपत्ति के लिए काम की आवश्यकता है। इसके बाद धर्म की राह आसान हो ही जाती है और जीवन सहजता के साथ सुखमय और ईश्वरीय समृद्धि को प्राप्त होता है। ध्यान को जीवन में स्थान दें तो आध्यात्म स्वत: ही जीवन में समाहित हो जाएगा।

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