बत्तीसवां दिन : झूठ की कभी परीक्षा नहीं होती – अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantचिंतन, मौन साधना

मुनि पूज्य सागर की डायरी से

मौन साधना का 32वां दिन। इतिहास पर यदि एक नजर डालें तो पता चलेगा कि सत्य को सदैव ही परीक्षा से गुजरना पड़ा है और हमेशा सत्य की ही जीत हुई है। व्यक्ति को हमेशा सत्य पर डटे रहना चाहिए तभी वह अपनी शक्ति और प्रतिभा को निखार सकता है। सत्य बोलने वाले व्यक्ति को किसी से डरना या भयभीत भी नहीं होना चाहिए। डर और भय तो उसे होता है जो झूठ की नींव पर खड़ा होता है। परीक्षा देने और उसमें उतीर्ण होने का उत्साह तो उसे ही होता है जिसने इसकी पहले से तैयारी कर रखी हो।

सत्य भी कुछ ऐसा ही है। जो व्यक्ति सत्य के मार्ग पर चलता है, वह घबराता नहीं है बल्कि हमेशा उत्साही रहता है। उसी सोने की परीक्षा ली जाती है जो सोना माना जाता है। जिसे सोना माना ही नहीं गया उसकी तो क्या परीक्षा होगी। जीवन में सोने की भांति ही सत्य की भी परीक्षा होती है, लेकिन झूठ की कभी परीक्षा नहीं होती। जो व्यक्ति सत्य की राह पर चलता है, उसे परेशानियों का सामना भी जरूर करना पड़ता है। सत्य कड़वा होता है उसे पचाना मुश्किल होता है। सत्य बोलने वाले व्यक्ति अपने मार्ग पर आगे बढ़ते जाते हैं और लक्ष्य भी प्राप्त कर लेते हैं।

सत्य के सहारे से लक्ष्य को प्राप्त करने वाले व्यक्ति से न तो कोई प्रश्न पूछने वाला होता और न ही उसे किसी को उत्तर देने की जरूरत होती है। उसकी सफलता ही हर प्रश्न का जवाब होता है। सत्य कभी बनावटी नहीं होता है। हमेशा से ही सत्य पवित्र, पावन और सम्मानीय है। सत्य प्राकृतिक है उसे किसी की जरूरत नहीं, वह अपने बल पर ही बना रहता है और उसका बना रहना ही उसकी पवित्रता का प्रमाण है। सत्य शब्दों का खेल नहीं, पवित्र मन की मौन आवाज है जिसका अहसास किया जा सकता है उसे शब्दों से बयां नहीं किया जा सकता। धर्म की साधना का आनंद तो वही ले सकता है जिसने सत्य को अहसास किया हो। हमेशा दाग सफेद कमीज में ही देखा जाएगा, मलिन कमीज में नहीं। सत्य को बनाए रखने के लिए समता और पवित्रता की आवश्यकता होती है।

रविवार, 5 सितम्बर, 2021 भीलूड़ा

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