भाग पैंतीस : आचार्य श्री शांतिसागर की जिन साधना के फल से गूंगा लगा था बोलने – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantशांति कथा

बात कोल्हापुर के नीमसिर ग्राम के पैंतीस वर्ष युवक की है, लोग उसे अण्णाप्पा दाढ़ीवाले के नाम से जानते थे। शास्त्र चर्चा बहुत करता था, अचानक एक दिन उसकी आवाज चली गई और वह गूंगा हो गया। इस कारण वह बहुत दुखी रहने लगा। उसे लोगों के सामने जाने में शर्म आने लगी। इस घटना के एक वर्ष के बाद वह आचार्य श्री शांतिसागर महाराज के पास गया। आचार्य श्री ने उससे आग्रहपूर्वक कहा कि बोलो, तुम बोलते क्यों नहीं। आचार्य श्री ने उससे णमो अरिहंताणं पढ़ने को कहा और बस यह पद पढ़ते ही उसने फिर से बोलना प्रारम्भ कर दिया। सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। चार-पांच  दिन आचार्य श्री के साथ रहने के बाद वह वापस अपने घर चला गया लेकिन घर जाते ही वह वापस गूंगा हो गया। कुछ समय बाद मुनि पायल सागर महाराज उससे मिले। उसने इशारों-इशारों में महाराज को सारी बात बता दी। इस पर मुनि पायल सागर महाराज ने उससे कहा कि तुम वहां से वापस क्यों आ गए, तुमने यह भूल क्यों की। वह फिर से आचार्य श्री के चरणों में पहुंचा। वहां जाने के बाद वह वापस बोलने लगा। यह तपोमूर्ति आचार्य श्री की जिन साधना का ही फल था कि गूंगा भी बोलने लग गया।

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