इक्कीसवां दिन : जीव का हर क्षण उसके कर्म के अधीन – अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantचिंतन, मौन साधना

मुनि पूज्य सागर की डायरी से

मौन साधना का 21वां दिन। अहंकार में मनुष्य अपने आत्मिक स्वभाव से च्युत हो जाता है। अहंकार मीठा जहर है जिसे खाने पर पता नहीं चलता, पर जब उसका परिणाम मृत्यु के रूप में आता है तब पता लगता है कि उसकी मृत्यु जहर खाने से हुए है। अहंकार सोचने, समझने की शक्ति नष्ट कर देता है। इंसान अहंकार में जीता है कि दुनिया में उससे अच्छा, ,धनवान, शक्तिशाली, ज्ञानी और सुंदर कोई नहीं है। अपनी प्रशंसा और दूसरों की निन्दा भी अधर्म है, अहंकार में इसका भी ज्ञान नहीं रहता है। अच्छाई, धन आदि पुण्य से प्राप्त होते हैं तो फिर पुण्य से मिले द्रव्य का अहंकार कैसा? यह चिंतन भी नहीं कर पाते हैं। पुण्य से विनय आदि गुण आते हैं। अहंकार की ताकत देखो, पुण्य से भी पाप के विचार करवा देता है।
रावण पुण्यशाली और धर्मात्मा था, पर अहंकार ने उसका सब कुछ छीन लिया। रावण को जब अहंकार का एहसास हुआ तब तक तो वह अपने पुण्य को पाप में बदल चुका था। अहंकार में तो कोई यह भी नहीं समझना चाहता है कि एक दूसरे के बीच लड़ाई, मनभेद, मतभेद अहंकार के कारण ही हो रहे हैं। अहंकार इस सच्चाई से भी साक्षात्कार नहीं होने देता कि उसकी जीवन की हर एक घटना, सुख-दुख, कर्म के अधीन है। अहंकार में कर्म के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता और अहंकार में वह अपने सुख का कारण अपने को और दुख का कारण दूसरों को मानता है।
पर वास्तविकता तो यह है कि जीव का हर क्षण उसके कर्म के अधीन है। अहंकार को छोड़ने वाला ही मनुष्य पर्याय में मनुष्य बना रहा सकता है।

बुधवार, 25 अगस्त, 2021 भीलूड़ा

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