कहानी : कभी ना करो मुनि का अपमान – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज

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पद्मपुराण के पर्व 9 में बाली मुनि और रावण के जीवन का एक प्रसंग आता है जो हमे शिक्षा देता है कि मुनियों का अपमाना कभी भी नही करना चाहिए।

कथा इस प्रकार है –

राजा बाली का नियम था कि वह जिनेन्द्र भगवान के अलावा किसी को नमस्कार नही करेगा। रावण चाहता था कि बाली उसे नमस्कार करे। बाली ने अपने भाई सुग्रीव को कहा कि मैं न तो अपना नियम तोड़ना चाहता हूं और ना ही बिना प्रयोजन हिंसा चाहता हूं इसलिए मैं तो इस संसार के चक्कर से छुटाकारा पाने के लिए मुनि बन रहा हूं और तुम अब यह राज्य संभालो। तुम रावण को नमस्कार करो या नही, अपनी बहन दो या नहीं मुझे इससे मतलब नहीं है। मैं तो आज ही घर छोड़कर कर मुनियों के पास जा रहा हूं और मुनि बनकर आत्म ध्यान करूंगा। बाली इतना कहकर गगनचंद्र मुनि के पास दीक्षित हो गया। बाली मुनि बनकर कर कैलास पर्वत पर ध्यान कर रहे थे उसी समय कैलाश पर्वत के ऊपर से रावण का विमान जा रहा था। वह रूक गया तब मंत्री ने कहा कि पर्वत पर मुनिराज ध्यान कर रहे हैं। यह विमान मुनियों का उल्लंघन कर आगे नही जा सकता है। तब रावण विमान से नीचे उतरा और देखा कि बाली मुनि ध्यान कर रहे हैं। रावण को क्रोध आ गया और मुनि को कष्ट देने के भाव से वह कैलाश पर्वत को उठाने लगा, पर वह उठा नही पाया, क्यों कि बाली मुनि के तप का प्रभाव था। बाली जानते थे कि रावण अगर कैलाश पर्वत रावण उल्टा कर देगा तो यहां बने जिनमंदिर नष्ट हो जाएंगे। बाली ने अपने पांव के अंगूठे से पर्वत को दबाया और वह पर्वत को नही उठा सक।

रावण ने बाली मुनि के तप का प्रभाव देखा तो उसे पश्चात्ताप हुआ कि उसने ऐसा क्यों किया। रावण में बाली मुनि की पूजन की और उनसे क्षमा मांग ली।

अनंत सागर
कहानी
तेतालीसवां भाग
19 फरवरी 2021, शनिवार, बांसवाड़ा

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