‘जैसी करनी, वैसी भरनी’- अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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एक गांव में दो मित्र रहते थे। एक बार उन्हें एक बड़ा खजाना मिला। कपटी मित्र ने कहा कि आज मुहूर्त ठीक नहीं, इसलिए हम कल आकर ले जाएंगे। सच्चे मित्र ने जवाब दिया- अच्छी बात है। फिर कपटी मित्र ने रात को आकर खजाना निकाल लिया और उसकी जगह कोयले भर दिए।
अगली सुबह दोनों खजाना लेने चले। खोदकर देखा तो कोयले निकले। कपटी मित्र ने कहा, “हमारे दुर्भाग्य से खजाने के कोयले हो गए!’ दूसरा मित्र उसकी चालाकी समझ गया। उसने कहा, ‘क्या किया जाए, हमारा भाग्य ही ऐसा है।’ कुछ समय बाद सच्चे मित्र ने अपने कपटी मित्र की एक मूर्ति बनवाई और दो बंदर पाले। वह प्रतिदिन मूर्ति के ऊपर बंदरों के खाने की चीजें रख देता और उसके ऊपर चढ़कर बंदर सब चीजें खा जाते।
एक दिन उसने अपने कपटी मित्र के दोनों लड़कों को भोजन के लिए आमंत्रित किया। लड़के भोजन के लिए आये तो उसने उन्हें कहीं छिपा दिया। फिर पूछने पर कह दिया कि वे बन्दर बन गये हैं। लड़कों का पिता उनका पता लगाने के लिए वहां आया, तो उसने अपने कपटी मित्र को मूर्ति की जगह बैठाकर उसके ऊपर बंदर छोड़ दिये। बंदर उसके साथ खेलने लगे। उसने कहा, “लो ये ही तुम्हारे लड़के हैं।’ कपटी मित्र कहने लगा, “कहीं लड़के भी बन्दर बन सकते हैं?’ उसके मित्र ने जवाब दिया, “तो फिर खज़ाने का कोयला कैसे बन सकता है?’

अनंत सागर
27 सितम्बर, 2020, रविवार, लोहारिया
कहानी
(बाईसवां भाग)

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