‘अवसर की पहचान’

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एक बार एक ग्राहक चित्रों की दुकान पर गया। उसने वहां पर अजीब से चित्र देखे। पहले चित्र में चेहरा पूरी तरह बालों से ढका हुआ था और पैरों में पंख थे। एक दूसरे चित्र में सिर पीछे से गंजा था।
ग्राहक ने पूछा, ‘यह चित्र किसका है?’
दुकानदार ने कहा, ‘अवसर का।’
ग्राहक ने पूछा, ‘इसका चेहरा बालों से ढका क्यों है?’
दुकानदार ने कहा, ‘क्योंकि अक्सर जब अवसर आता है तो मनुष्य उसे पहचानता नहीं है।’
ग्राहक ने पूछा, ‘और इसके पैरों में पंख क्यों है?’
दुकानदार ने कहा, ‘वह इसलिए कि यह तुरंत वापस भाग जाता है, यदि इसका उपयोग न हो तो यह तुरंत उड़ जाता है।’
ग्राहक ने पूछा, ‘और यह दूसरे चित्र में पीछे से गंजा सिर किसका है?’
दुकानदार ने कहा, ‘यह भी अवसर का है। यदि अवसर को सामने से ही बालों से पकड़ लेंगे तो वह आपका है।’
अगर आपने उसे थोड़ी देरी से पकड़ने की कोशिश की तो पीछे का गंजा सिर हाथ आएगा और वो फिसलकर निकल जाएगा। वह ग्राहक इन चित्रों का रहस्य जानकर हैरान था पर अब वह बात समझ चुका था।
इस कहानी का नैतिक मूल्य यह है कि भगवान ने हमें ढेरों अवसरों के बीच जन्म दिया है। अवसर हमेशा हमारे सामने से आते-जाते रहते हैं पर हम उसे पहचान नहीं पाते या पहचानने में देर कर देते हैं और कई बार हम सिर्फ इसलिए चूक जाते हैं क्योंकि हम बड़े अवसर की ताक में रहते हैं पर अवसर बड़ा या छोटा नहीं होता है। हमें हर अवसर का भरपूर उपयोग करना चाहिए।

अनंत सागर
4 अक्टूबर, 2020, रविवार, लोहारिया
कहानी
(तेईसवां भाग)
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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