कर भला तो हो भला – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज

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जो जीव किसी का अच्छा करता है तो बदले में उसे अच्छाई ही मिलती है। वहीं जो जीव किसी का बुरा करता है तो उसे भी बदले में बुराई मिलती है। यह संसारी जीवों की क्रियाओं का नियम है, इसलिए सभी जीवों का उपकार ही करना। किसी जीव से बैर मत करना। इस बात को पद्मपुराण के 39वें पर्व में वर्णित एक कथा से समझते हैं-

उदित और मुदित नाम के दो मुनिराज थे। वह दोनो तीर्थराज सम्मेद शिखर जी की यात्रा करने जा रहे थे, लेकिन मार्ग भूल गए और वन में भटक गए। उस वन में एक भील ने दोनों मुनिराज को देखा तो उसे क्रोध आ गया। उसने कठोर वचन बोले और दोनों मुनिराजों को मारने लगा। भीलों के राजा ने उसे ऐसा करने से रोका और मुनियों को बचाया। भीलों के राजा ने मुनियों को उनके पूर्व कर्म के कारण ही बचाया था। दोनों मुनिराज पूर्व भव में यक्षनाम गांव में सुरप और कर्षक नाम के दो भाई थे। उनके सामने एक शिकारी एक पक्षी को जीवित पकड़ कर लाया। दोनों भाईयों ने उस पक्षी को अपना धन देकर छुड़वाया। वह पक्षी ही इस भव में भीलों का राजा बना और सुरप और कर्षक दोनो भाई इस भव में उदित और मुदित के रूप में मुनिराज बने। यानी पूर्व भव में जिस पक्षी को बचाया था, उसने इस भव में भीलों का राजा बन कर दोनों भाइयों की जान बचाई।

यह कथा यह समझा रही है कि हम दूसरों के साथ जैसा करेंगे वैसा ही हमारे साथ होगा।

शब्दार्थ व्यवहारिक
क्रियाएं-कर्म, कथा-कहानी, पर्व-अध्याय।

अनंतसागर
कर्म सिद्धांत
चालीसवां भाग
02 फरवरी 2021, मंगलवार, बांसवाड़ा

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