कर्म का फल अवश्य मिलता है – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी

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यह बात सभी जानते हैं कि जब श्रीराम वनवास का समय व्यतीत कर रहे थे तो जटायु नाम का पक्षी उनके साथ हो था। उस पक्षी की कथा रोचक है। आखिर वह किस कर्म के जटायु पक्षी बना? एक सम्बन्ध में एक प्रसंग पद्मपुराण के 41 पर्व में अंकित है।

वह कथा इस प्रकार है- दंडकवन में जब श्रीराम सुगुप्ति और गुप्ति मुनिराज को आहार दान कर रहे थे तो उसी समय एक गृद्ध पक्षी मुनि के चरणों मे गिर पड़ा। तब श्रीराम ने उस पक्षी के बारे में सुगुप्ति मुनि से पूछा कि यह अपने किस पाप कर्म के कारण पक्षी बना है। तब मुनि ने कहा- यह दंडक वन पहले दंडक देश था, जो अपने काल में काफी संपन्न था। दंडक देश के राजा का नाम दंडक राजा था।

उसने एक बार अधर्म के प्रभाव में आकर मुनि के गले में मरा हुआ सर्प डाल दिया। इसके बाद मुनि ने प्रतिज्ञा कर ली कि जब तक गले में मरा हुआ सर्प नहीं निकलेगा, तब तक ध्यान ही करता रहूंगा। कुछ समय बाद एक व्यक्ति ने मुनि के गले से सर्प निकाला। मुनि की सेवा की। उसी समय राजा वहां से निकल रहा था। उसने मुनि के पास बैठे उस व्यक्ति से पूछ कि ‘मुनि के गले में पड़ा सर्प कहां गया?’ तब उस व्यक्ति ने जवाब दिया कि ‘मैंने अभी उनके गले से सर्प निकाला है। पता नहीं किस पापी ने यह कर्म किया था।’

इस घटना के बाद राजा जैन धर्म का अनुयायी बन गया। यह बात रानी को पता चली, तो उसने अपने अन्य संप्रदाय के गुरुओं को दिगम्बर मुनि बनकर राजमहल में कामवासना की चेष्टा करने को कहा। उन्होंने वही किया। इस घटना से राजा को क्रोध आया। राजा ने मुनियों को घाणी में पेलने का आदेश दिए।

संयोगवश उस समय एक मुनिराज वहां नहीं थे। इसकी वजह से वे उस घाणी में पेलने से बच गए। उन्होंने जब यह घटना सुनी तो उनके क्रोध से सब जल गए और पूरा वन बन गया। इस क्रोध के कारण देश के साथ राजा भी जल गया। फिर वह अनेक कुयोनियों में जन्म लेने के बाद गिद्ध पक्षी बना है और पूर्व भव के स्मरण से यहां चरणों मे गिरा है। अब इसका पुण्य उदय आया है। अब यह समाधिमरण करेगा।

इस कथा के जरिए आपने देखा कर्मो का खेल। मुनि के अपमान से एक देश पूरी तरह वन बन गया। राजा कुयोनियों में भ्रमण कर उसी वन में गिद्ध पक्षी बना। इस गिद्ध पक्षी का जटायु नाम श्रीराम ने दिया था।

अनंतसागर
कर्म सिद्धांत
इकचालीसवां भाग
09 फरवरी 2021, मंगलवार, बांसवाड़ा

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