प्रेरणा : कितना भी शत्रु भाव हो पर मानवता जरूरी है – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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पद्मपुराण के पर्व 75 में मानवता की नीति के संबंध में एक प्रेरणादायी प्रसंग आता है।

जब लक्ष्मण और रावण का युद्ध हो रहा था तो युद्ध की नीति थी कि दोनों पक्ष के खेद खिन्न, महाप्यास से पीड़ित योद्धाओं के लिए मधुर तथा शीतल जल की व्यवस्था की जाती थी। भूख से दु:खी योद्धाओं के लिए भोजन दिया जाता था। पसीने और गर्मी से त्रस्त योद्धाओं को चन्दन दिया जाता था। पंखे आदि से हवा की जाती थी। ठंडे पानी के छींटे दिए जाते थे। इसके अलावा और कोई भी काम हो उसके लिए पीड़ित के पास वाला योद्धा सहायता के लिए तैयार रहता था।

यह नियम दोनो पक्ष के लोगों के लिए था। युद्ध में मेरा और पर का भेद नहीं होता है। पद्मपुराण के इस प्रसंग से प्रेरणा लेनी चाहिए कि अधिकारों की लड़ाई लड़ें पर मन में दया, करुणा, प्रेम, वात्सल्य का भाव बनाए रखें। तभी राज्य समृद्ध, शक्तिशाली और विकसित बन सकता है। युद्ध युद्ध की जगह है पर उसके साथ मानवता का होना जरूरी है। तभी एक दूसरे के साथ मिलकर रह सकते हैं, नहीं तो आपस में लड़ते हुए अंदर ही अंदर एक दूसरे को काटेंगे। फिर शत्रु से खतरा से ज्यादा अपनों से खतरा हो जाएगा और जब अपने ही शत्रु हो जाएंगे तो फिर दूसरे युद्ध जीत भी जाएं तो कोई फायदा नहीं होगा, क्योंकि अपने घर में बैठा शत्रु बाहर कई शत्रु फिर बना देगा, इसलिए आपस में मित्रवत रहना चाहिए जिससे असम्भव लग रहा कार्य भी सम्भव हो जाता है।

अनंत सागर
प्रेरणा
उनचासवां भाग
8 अप्रैल 2021, गुरुवार, भीलूड़ा (राजस्थान)

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