भाग सात : मैं रावण… दानी, अहिंसक और धर्म संरक्षक! – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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रावण @ दस : भाग सात

मैं दिग्विजय पर था, तभी अचानक दूत से समाचार मिला कि राजा मरुत्व संर्वत ब्राह्मणों के साथ मिलकर हिंसक यज्ञ कर रहा है, जिसमें निरीह पशुओं की बलि दी जानी है। ऐसा न करने को जब नारद उन्हें समझाने पहुंचे तो उन्हें भी राजा ने पीटा। यह सुनते ही मैं अपनी सेना के साथ यज्ञ भूमि पर पहुंच गया। मैंने हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई, राजा और ब्राह्मणो को समझाया। जब वे नहीं माने तो मेरी सेना ने उन्हें दण्ड दिया। फिर उन्हें समझाया कि जब तुम्हें इस दण्ड से तकलीफ हो रही है तो यज्ञ में पशुओं की बलि देने पर क्या उन्हें कष्ट नहीं होगा। किसी भी प्राणी को कष्ट देने वाली कोई क्रिया धर्मसम्मत नहीं हो सकती। ये धर्म नहीं, अधर्म है।

आपसे प्रश्न करूं… मैं तो अपना सारा काम- काज छोड़ हिंसा रोकने पहुंच गया। पर क्या, आप अपना कोई भी काम छोड़ किसी की मदद को पहुंचते हैं। अरे, आपको तो फर्क ही नहीं पड़ता। अगर आप किसी कार्य पर जा रहे हैं और रास्ते में किसी की दुर्घटना को होते देख लेते हैं तो भी उस इंसान की मदद को आगे नहीं आते। कहते हैं, इतना समय नहीं, देर हो रही है। जब इंसानों के लिए आपके मन में दया नहीं तो पशुओं का क्या है, आप तो उनकी चमड़ी से बने कई सामान फैशनके नाम पर उपयोग करने में भी नहीं हिचकते। फिर भला… आप मुझे जलाने के अधिकारी कैसे हो सकते हैं? जानते हो, अगर वो हिंसक यज्ञ हो गया होता तो अनर्थ हो जाता। मैं तो ऐसे कई कार्य अपनेअति महत्वपूर्ण कार्यों को रोककर भी पूर्ण करता था लेकिन आप नहीं समझ सकते। आप अपने मतलब के आगे सारी गलियां निकाल लेते हो।

चलो, दूसरे बिंदु पर आते हैं। मेरी अठारह वर्ष की दिग्विजय यात्रा पर मैंने धर्म के नाम पर कोई बुरा कार्य नहीं किया। बल्कि उस दौरान जहांकहीं मुझे जीर्णशीर्ण जिन मंदिर मिलते, मैं उनका जीर्णोद्धार करवाता, पर कभी पूरा मंदिर तोड़ उसे नया रूप देने के लिए उसका विध्वंस नहीं करता क्योंकि मैं जानता था कि इतिहास मंदिरों की शिल्पकला और उनकी प्राचीनता से है। इसलिए सदा प्राचीन को उसी स्वरूप में रखकर ठीक करवाया। साथ ही जहां मंदिर नहीं थे और आवश्यकता थी, वहां मैंने नए मंदिरों का निर्माण भी करवाया। जो अशक्त मिले, जरूरतमंद मिले, उन्हें दान देकर मदद की। ना कि उन्हें गुलाम बनाकर रखा। मेरे बसाए स्वयंप्रभ नगर में चन्द्रप्रभ भगवान का चैत्यालय था। लंका में कई जिनमंदिर और चैत्यालय थे। लंका के मेरे महल में शांतिनाथ भगवान का चैत्याल्य था जहां पर बैठकर मैंने बहुरुपिणी विद्या सिद्ध की थी । इतना ही नहीं, मेरे पुष्पक विमान में भी चैत्यालय था। तुम बताओ, धर्म साधना के आधारभूत भगवान मेरे जीवन का अहम हिस्सा थे, क्या आपके जीवन में ऐसा है? आपके घरों में तो भगवान का स्थान तक नहीं है और तो और जिनमंदिर जाने का नियम भी आपकी सुविधा के अनुसार चलता है। जिनबिम्ब दर्शन के बिना आपका मन कैसे निर्मल हो सकता है।

जिस घर में भगवान का स्थान नहीं, वह घर कैसे हो सकता है वह वन ही है। मैं तो अहिंसा का पुजारी था, दान, पूजा और मन्दिर का संरक्षण करना मेरा धर्म था। मेरे इन्हीं पुण्यकर्मों के कारण मैं भविष्य का तीर्थंकर बनने वाला हूं। क्या मुझे जलाने वालों में से कोई है जो वास्तविकता में अहिंसा धर्म का पालन करता हो, फिर क्यों कर मुझे जलाते हो! मेरा अनादर करने, मेरे पुतले को जलाने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। तुम अपने लिए ही अशुभ कर्म का बन्ध बना रहे हो, अपने परिणाम बिगाड़ रहे हो, कहीं ऐसा ना हो कि भविष्य में तुम भी मेरी ही तरह जलाए जाओ।

I Ravana…Benevolent, Nonviolent, Defender of Faith! – Antamukhi Muni Pujya Sagar Maharaj

Ravan@ten : Part Seven

I was on world conquest when I received news that King Marutva was organizing a brutal Yajna (ritual worship) with Brahmanas (priests) which involved sacrifice of animals. The king even assaulted Narada who tried to dissuade him. On hearing this I went to the place of Yajna with my troops. I spoke against the violence being perpetrated and tried to reason with the king and Brahmanas. However, this proved futile and my troops had to punish them. I explained that just as they found the punishment harsh, the animals too would feel pain and suffering in the yajna. No action that results in suffering to a living being can be in accordance with religion. This is not religion but sacrilege. I want to ask you…I went there selflessly to stop violence…but do you help others setting aside your selfish needs? If you are on your way and witness an accident, you do not bother and come forward to help the person. You say you do not have time for this. When you do not have compassion for humans, what can be expected for animals? You do not hesitate to use articles made from their fur and hide in the name of fashion…then how are you worthy of burning me? It would have been calamitous if that violent yajna had taken place. I would often perform such altruistic acts even at the expense of my own pressing needs, but you would not understand. You cannot see beyond you petty selfish interests.

Let us move on. During my eighteen years of world conquest I never committed an offence in the name of religion. Instead I would restore wherever I found dilapidated Jina temples. I never razed entire temples to start new construction because I respected the history, sculpture and architectural style. Therefore I always renovated temples with the ancient form in mind. Additionally, where there was need I built new temples. I gave alms to the weak and poor instead of enslaving them. I founded Swayamprabha Nagar which had Chaityalaya (worship hall) devoted to Lord Chandraprabha). Lanka had many Jina temples and Chaityalayas.My palace in Lanka had Lord Shantinath’s Chaityalaya where I attained the Bahurupini Vidya (art of disguise). Even my Pushpak craft had a Chaityalaya.

The Lord, basis of all religion and meditation was the focus of my life. Is that the case with you? You do not have a place for God in your homes. You visit temples as per your whims. How can you cleanse your mind without beholding the image of Jina? A home without a place for God is akin to a jungle. I believed in non-violence. Charity, worship and protection of temples were my duties. I will go on to attain the status of Tirthankar due to these virtues. Is there anyone among you who truly practices the principle of nonviolence…? Then why do you burn me? Abusing or burning my effigy does not affect me. You are amassing sinful actions which will ruin your destiny. Lest you also will one daybe burnt down like me…

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