भाग दस : मैं रावण… मेरा अंतिम संवाद! – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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रावण @ दस : भाग दस

पिछले नौ दिनों में मैंने आपको मेरे जीवन के शुभ-अशुभ से मिले परिणामों को बताया। कर्मों की गति निराली है- कब ज्ञानी अज्ञानी बन जाए और कब अज्ञानी, ज्ञानी हो जाए… कोई नहीं जानता। आज आपसे मेरी आखरी वार्ता… कुछ भावुक है तो कुछ उपदेशात्मक।

आज मैं आपसे अपने परिवार की बात करूंगा, क्योंकि उनके बिना मेरा अस्तितत्व नहीं है। वैसे भी संसारी व्यक्ति, गृहस्थ व्यक्ति का परिवार नहीं तो संस्कार और धर्म कैसा? मैं धर्मात्मा था। इससे स्पष्ट है कि मेरा परिवार भी धर्मात्मा और संस्कारवान था। मेरा परिवार बहुत बड़ा था। पर शुरू करता हूं अपने दादा से… मेरे परिवार मैं, दादा सुमाली, पिता रत्नश्रवण, मां कैकसी, भाई भानुकर्ण (कुम्भकर्ण) विभीषण, बहन चन्द्रनखा, पत्नी और पटरानी मन्दोदरी, पुत्र इंद्रजीत व मेधवान जिनसे मैं सर्वाधिक प्रेम और स्नेह करता था। मेरा परिवार देव, शास्त्र, गुरु का उपासक था। मेरे भाई भानुकुर्ण ने सर्वाहाएरतिसंवृद्धिएजृम्भिणीएव्योमगामिनी और निद्राणी, ये पांच विद्याएं मेरे साथ भीमवन में सिद्ध की, वहीं विभीषण ने सिद्धार्थाएशत्रुदमनीएनिव्र्याघाता और आकाशगामिनी चार विद्याएं सिद्ध की थी । जब मैंने अनंतबल मुनिराज से परस्त्री का भोग उसकी बिना इच्छा के नहीं करने का नियम लिया तब भानुकर्ण ने प्रतिदिन प्रात:काल उठकर भगवान जिनेन्द्र की स्तुति, अभिषेक व पूजन का नियम लिया था। विभीषण ने गृहस्थ धर्म का नियम लिया।

मैं इन सबका परिचय इसलिए करवा रहा हूं ताकि आप जान सको कि मैं कितने संस्कारवान और पुण्यशाली परिवार का हूं। आपको बता दूं कि हम सब भाई बहन एक-दूसरे के लिए हमेशा सहयोगी बने, चाहे परिवार हो, युद्ध हो या साधना हो, जब हम भाई साधना के लिए वन जाते तो बहन जिनमंदिरों, महलों और अतिथियों के साथ पूरे परिवार का ख्याल रखा करती। सेवा करती। एक भाई दूसरे भाई को कभी अधर्म का कार्य नहीं करने देता था, पर ये मेरे पापकर्मों का उदय था कि पूरे परिवार के समझाने के बावजूद मैं नरक का भोगी बना। वहीं, यह मेरे परिवार के ही संस्कारों और मेरे पुण्यकर्मों का उदय था जो मैं तीर्थंकर होने का अधिकारी बन सक।

मेरे परिवार के धार्मिक और पुण्यशाली होने का प्रमाण ही है कि मेरे भाई और पुत्र मुनिदीक्षा धारण कर मोक्ष को प्राप्त हुए हैं। आज जो निर्वाणकांड पढ़ते हो, उनमें उनका नाम भी लिया जाता है। मेरी पत्नी और पुत्री ने भी आर्यिका दीक्षा धारण की। विभीषण लंका नगरी पर धर्मपूर्वक राज्य करने लगा । जो मोक्ष गए हैं, उनके संस्कार कैसे होंगे, यह तो आप भी जानते ही हैं। लगभग मेरा पूरा परिवार ही दीक्षा धारण कर या तो स्वर्ग गया या मोक्ष को प्राप्त हुआ। इससे अधिक पुण्य और क्या हो सकता है कि मुझे ऐसे मोक्षगामी परिजनों को साथ और ऐसे कुल में जन्म मिला।

आप भी विचार करो… मुझे जलाने और मेरे परिवार को जलाने, लंका को जलाने की बजाय… हमारे परिवार की तरह एक दूसरे के साथ मिलजुलकर रहो। एक दूसरे को धार्मिक कार्यों के लिए प्रेरित करो और साधना में सहयोगी बन अपने परिवार के हर सदस्य के मोक्षमार्ग को प्रशस्त करो ताकि मनुष्य जन्म सफल हो सके। अमूल्य मनुष्य देह को जाया न जाने दो, इस जन्म का प्रायोजन सिद्ध करो… अपने परिणाम शुद्ध करो।

I Ravana…my Last Dialogue! – Antarmukhi Muni Pujya Sagar Maharaj

Ravan@ten : Part Ten

During the past nine days I have described consequences of good and evil acts in my life. The course of karma is unfathomable. When a learned man becomes foolish and a fool becomes wise cannot be foretold. Today is my last discourse with you…partly emotional and partly sermonizing. I will talk about family today because I am nothing without it. What are the duties and rituals of a worldly householder save for his family? I was devout and my family was religious and devotional as well. I had a large family but I will begin with my grandfather Sumali, my father Ratnashravana, mother Kaikesi, brothers Bhanukarna (Kumbhakarna) and Vibhishana, sister Chandranakha, wife and Queen Consort Mandodari, sons Indrajeet and Medhwan, whom I loved and adored the most.

My family worshipped Deva, Shastra (scriptures) and guru. My brother Bhanukarna mastered the five arts of Sarvahartisam vriddhiajrimbhinia vyomagamini and Nidrani with me in Bhimvana. Vibhishana became skilled in the four arts of Siddhartha shatrudamaniani vryaghata and Akashagamini. While I took oath before Muni Anantabal to never establish a physical union with another woman against her will, Bhanukarna pledged to worship, pray and perform Abhisheka (ritual cleansing) of Lord Jinendra every morning. Vibhishana promised to perform the duties of a householder. I am acquainting you with them so you realize that I belonged to a devout and righteous family. All of us siblings always collaborated with each other in matters of family, worship or war. When we brothers would go to the forest for meditation, our sister would look after and serve Jina temples, palaces, guests along with the entire family. We brothers would never let each other commit any act of sin. However it was the result of my evil karma that despite being dissuaded by the whole family I became deserving of hell. At the same time, it was karma of my good deeds and Samskaras of my family that I became worthy of achieving status of Tirthankara.

The proof of my family’s devoutness and virtue is that my son and brother have attained Moksha (liberation) by teachings of Muni. Today the Nirvanakand evokes their names. My wife and daughter also undertook the Aryika Diksha. Vibhishana justly ruled over the city of Lanka. You can envisage the kind of Samskaras of people who have attained Moksha. Nearly my whole family accepted Diksha, went to Swarga (heaven) or achieved Moksha. What can be more virtuous that I was borne in such noble family and had company of these liberated souls?

You should consider… instead of burning Lanka and my family, learn to live in harmony like my family. Encourage each other to perform holy deeds, and help each other in prayer towards the path of Moksha, so that you can fulfil your life as a human being. Do not squander this invaluable human form, realize the purpose of your life…cleanse your destiny.

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