भाग नौ : मैं रावण…मेरा पछतावा मेरी अच्छाई का प्रमाण! – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantरावण

रावण @ दस : भाग नौ

मैंने सीता का हरण तो किया, पर उसके साथ भोग नहीं किया, क्योंकि वह मुझे नहीं चाहती थी। वह मेरे अपने महल में थी तो भी मैंने जबरन उस पर अधिकार जमाना नहीं चाहा। मेरी पत्नी पटरानी मंदोदरी ने भी सीता को समझाया था कि तुम रावण को स्वीकार कर लो, पर सीता के मना करने पर कभी मैंने बल प्रयोग नहीं किया। सीता का हरण, मेरा अपराध था, मेरी बुराई थी, पर सीता को स्पर्श तक नहीं करना मेरी अच्छाई थी, मेरी नेकी थी। एक बात बताऊं, जब मैं सीता का हरण कर उसे विमान से लंका ले जा रहा था तब सीता राम वियोग में आर्तनाद करते हुए विलाप कर रही थी, मैं उसके आंसूओं को देख विरक्त हो गया था। मैंने उसे अपने से दूर बैठा दिया। मैं सीता से नजर भी नहीं मिला पा रहा था।

मैं उसे वहीं छोड़ना चाहता था, पर विधि का विधान था और मेरे मन का विचार कि इसे धन, वैभव, शक्ति, धार्मिक क्रिया, खाने-पीने के व्यंजन और अन्य प्रभावों से परिचित करवाकर इसका मन परिवर्तित करूंगा और अपना बना लूंगा। यह केवल मेरा विचार था, मैं एक पतिव्रता स्त्री की भावनाओं को समझ नहीं पाया कि सीता जैसी नारी इन तुच्छ वस्तुओं के छलावे में नहीं आती। पर मैंने अपना संयम नहीं खोया। बताओ, आज के जमाने में कोई है जो सारे साधन और शक्ति होने के बाद स्त्री के मोह में संयम रखे, अरे आज तो लोग अपने रुतवे और धन का इस्तेमाल स्त्री की मर्यादा को तार-तार करने में करते हैं और उसे रावण वृत्ति कहते हैं? नहीं, मैं रावण संयमी था। ये मेरी वृत्ति नहीं। मैं सीता के लिए व्याकुल हुआ, यह मेरे पाप कर्म का उदय था, क्योंकि इसके बाद मेरा सबकुछ चला गया। परस्त्री की भावना मात्र ने मुझसे शक्ति, धन, ज्ञान, विनय और अपने भाई, बेटा, पिता, मंत्री, पत्नी, बहन, मित्र को दूर कर दिया। सीता का हरण करने के बाद ही मैं अहंकारी हुआ और गुरु का अविनय करने लगा। मेरे भाई विभीषण ने मेरा त्याग कर दिया। मैं युद्ध में मारा गया। कोई कहता है राम ने मारा, कोई कहता है लक्ष्मण ने। राम तो दयालु थे, वो शत्रु से प्रेम करते थे, और फिर जिनका भाई लक्ष्मण हो, उसे युद्ध की क्या आवश्यकता। लक्ष्मण नारायण थे और मैं प्रतिनारायण। हमारे बीच युद्ध होना ही था और मेरा अंत भी निश्चित था। मेरा संहार तो मेरे कर्मों की गति का परिणाम था।

मैं यहां आपके समक्ष वह कह रहा हूं जो मेरे मन की पीड़ा है, ज्ञानी के अज्ञानमयी अंधकार में खोने की वजह है। पर अपनी कमजोरी और पापकर्म का बोध कर आत्मग्लानि के साथ प्रायश्चित करना आसान नहीं, यह तो कोई पुण्यशाली जीव ही कर सकता है और मैं हूँ पुण्यशाली क्योंकि मैं मुक्त होकर मनुष्य से तीर्थंकर होने का अधिकारी बन चुका हूं।

आप ही बताओ कि कीचड़ में यदि आपको हीरा नजर आए तो क्या करोगे, हीरे की संपूर्ण चमक को देखने के लिए उस पर से कीचड़ हटा दोगे और हीरे को ही सजाओगे या फिर कीचड़ का रोना ही रोते रहोगे? तो हीरे को पा सकोगे क्या? मेरे जीवन के गुणों की चमक ही आपका भला कर सकती है। मेरे जीवन के एक गलत कार्य के कीचड़ को हटाकर मेरे अनन्य सद्गुणों को देखोगे, समझोगे और सिर्फ उन्हें ही धारण करोगे तो अवश्य ही आपके परिणाम शुद्ध होंगे ना कि मेरे पुतले को जलाकर मुझे कोसने से।

I Ravana… Repentance is proof of my righteousness!- Antamukhi Muni Pujya Sagar Maharaj

Ravan@Ten : Part Nine

I abducted Sita but did not establish physical relations with her because she did not love me. Even when she was in my palace I never wanted to force myself upon her. My Queen Mandodari tried to persuade Sita to accept me but when she refused, I did not used force. Abducting Sita was a crime, a sin, but the fact that I did not even touch her was my virtue and righteousness.
Let me tell you when I was taking Sita on my craft, grieved by separation from Rama, she was wailing stridently. I was saddened to see her tears.
I sat her away from me. I was unable to look her in the eye. I wanted to free her right there. But this was not in my destiny. I thought that I would be able to win her over by charming her with my wealth, grandeur, power, religiosity, extravagant fare and such worldly luxuries. However I was mistaken. I could not comprehend that a devoted wife like Sita cannot be lured by such petty material possessions. Yet I did not lose control over my feelings.

Can you tell me of anyone who, despite having all power and resources will control his lust for a woman? Today people use their wealth and status to disgrace the honor of women. Is this Ravana-like quality? No, I was self-disciplined, this is not my character. I longed for Sita and this was the beginning of my sinful karma which resulted in my total loss. The mere desire of another woman caused me to lose my power, wealth, wisdom, humility and my brothers, sons, father, sister, wife, friends and ministers.

I became arrogant after abducting Sita and disrespected my guru. My brother Vibhishana disowned me. I was killed in battle. Some say Rama killed me while others claim it was Lakshmana. Rama was compassionate; he had affection even for his enemies. Besides, who needs to go battle when one has a powerful brother like Lakshmana by his side? Lakshmana was Narayana and I was Pratinarayana. War between us was destined to happen and my end was certain. My destruction was the result of my karma.

Whatever I am saying now is the expression of regret in my heart, the reason for loss of an illuminated soul in the depths of darkness. But it is not easy to repent with the feeling of guilt by admitting one’s sins and failings. Only a righteous being can do this. And I am righteous because I have become worthy of being a Tirthankar by liberation from the cycle of life and death.

Tell me; if you see a diamond in mud would you acquire it and clean the dirt to see its brilliance or would you just lament about the filth? Can you acquire a diamond like that? The brilliance of virtues in my life can help you. It would be highly beneficial to you if, instead of burning me, you remove the filth of the one despicable act of my life and observe, understand and adopt my countless other virtues.

Related Posts

Menu