मैं राक्षस नहीं… राक्षस वंश का हूँ!

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– मेरा वंश पापियों का नहीं पुण्यात्माओं का है
लेखक- अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज

पिछली बार मैंने आपको अपने अच्छे और सच्चे पहलुओं से परिचित करवाने का वादा किया था आज उसी को निभा रहा हूँ। शुरुआत करता हूँ वहाँ से जहाँ मैंने जन्म लिया… किसी भी व्यक्ति की पहचान वैसे तो उसके व्यक्तित्व से होनी चाहिए लेकिन होती है वंश से, उसके परिवार और कुल से। मेरा कुल राक्षस कहलाता है और सामान्यत: लोग इसे पापियों और दुराचियों का वंश कहते हैं जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है। मेरा कुल या कहूँ वंश पापियों का नहीं पुण्यात्माओं का है।

प्रारंभ में चार ही वंश हुआ करते थे- इक्ष्वाकुवंश, ऋषिवंश, विद्याधरवंश और हरिवंश। समय और घटनाक्रम तथा व्यक्तित्व प्रभाव सहित अन्य कारणों से इन वंशों से कई वंशों का जन्म हुआ और मेरा राक्षस वंश… विद्याधर वंश से उत्पन्न हुआ। हमारे वंश का नाम एक समय के लोकप्रिय, प्रभावशाली, शक्तिशाली और बुद्धिमान राजा राक्षस के नाम पर पड़ा वे विद्याधर वंश के ही थे, पर उनकी प्रसिद्धि ने हमारे वंश को राक्षस नाम दे दिया। इतिहास गवाह रहा है कि जिस परिवार के सदस्य का समाज, राष्ट्र पर अधिक प्रभाव होता है उसका वंश उसी के नाम से जाना जाता है। ऐसा ही कुछ हमारे साथ था। यही नहीं मेरे पूर्वज जिस द्वीप पर राज्य करते थे उसका नाम भी राक्षस द्वीप था। यह द्वीप मेरे पूर्वज राजा मेघवान को राक्षसों के इंद्र भीम और सुभीम ने उपहार में दिया था। यह द्वीप सात सौ योजन लंबा और इतना ही चौड़ा था। लंका भी इसी द्वीप का हिस्सा है। इसलिए राक्षस द्वीप पर रहने के कारण भी हमारा वंश राक्षस वंश कहलाया। वास्तव में मेरा वंश धार्मिक और सत्विक होने के साथ परोकार करने वाला रहा है। मेरे पिता रत्नश्रवा और माँ वैâकसी धार्मिक प्रवृत्ति के थे। मैं खुद ईश्वर भक्त था। मेरी माँ ने एक स्वप्न देखा था कि हाथियों के एक बडे झुण्ड को विध्वस्त करता हुआ एक सिंह आकाश तल से उतकर माँ के मुखद्वार से उनके उदर में प्रवेश कर गया। मेरे पिता ने ही माँ को स्वप्न का प्रतिफल बताया था कि तुम एक शक्तिशाली जगत का हितकरने वाले, साहसी योद्धा को जन्म दोगी। एक बार बचपन में मैनें एक रत्नों के हार को उठाया जिसे मेरे वंश में किसी ने भी नहीं उठाया था और उसमें मेरे नौ अन्य चेहरे भी दिखाई दिए थे, तब मेरे पिता ने कहा था कि इसका दूसरा नाम दशानन होगा। अब आप ही बताओ कि जिस कुल के राजाओं ने मोक्ष और स्वर्ग में स्थान पाया हो, जहाँ जन्मा एक जीव आाने वाले समय में तीर्थंकर बन धर्म की स्थापना करने वाला हो, वह कुल कलंकित कैसे हो सकता है।

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