मनचाही वस्तु पर भी अधिकार नहीं – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantकर्म सिद्धांत

पद्मपुराण के पर्व 90 में प्रसंग आया है। यह प्रसंग हमें संदेश देता है कि मनचाही वस्तु मिलने पर भी कर्म के कारण हम उसका उपयोग नहीं कर सकते हैं। आप जाने क्या है वह प्रसंग…

शत्रुघ्न ने मधुरा पर विजय तो प्राप्त कर ली पर मधुरा राज्य पर राज नहीं कर सके। वजह, शूल रत्न के स्वामी चमरेन्द्र को शोक हुआ कि मेरे द्वारा दिए गए शूल रत्न को किसने पराजित किया? यह कहते हुए वह मधुरा के लिए निकल पड़ा। बीच में ही उसे गरुड़कुमार मिल गए। उन्होंने उन्हें रोक दिया। वह रुक तो गया, पर उसका क्रोध शांत नहीं हुआ। उसने मधुरा राज्य के लोगों पर उपसर्ग किया जिसके प्रभाव से वहां महारोग फैल गया। जो जहां खड़ा था, बैठा अथवा सोया था, वह वहीं मृत्यु को प्राप्त हो गया। यह देखकर शत्रुघ्न उनके कुल देवताओं के कहने पर अपनी सेना के साथ मधुरा से वापस अयोध्या आ गए। अयोध्या में उसका राम आदि ने सम्मान किया, जिनेन्द्र भगवान की पूजा की और दीन- दुखियों को दान दिया। आपने देखा कर्म का खेल- किस प्रकार मधुरा मिलने पर भी शत्रुघ्न मधुरा में रह नहीं सका।

अनंत सागर
कर्म सिद्धान्त
8 जून 2021,मंगवार
भीलूडा (राज.)

Related Posts

Menu