मनुष्य जन्म ही श्रेष्ठ – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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पद्मपुराण के पर्व 14 में मनुष्य भव की महत्ता को बताते हुए एक आत्मचिंतन वाला प्रसंग आया है। उसका कुछ अंश इस तरह है-

सम्यकदर्शन आदि से सहित मनुष्य पाप कर्मों का नाशकर मोक्ष प्राप्त करता हैं। यही धर्म का फल है। मनुष्य जन्म से सम्पूर्ण पापों का नाश संभव है, इसलिए मनुष्य भव ही सभी भवों में श्रेष्ठ है। जिस प्रकार मनुष्यों में राजा, मृगों में सिंह, पक्षियों में गरुड़ श्रेष्ठ है, जिस प्रकार तृणों में धान, वृक्षों में चंदन और पत्थरों में रत्न श्रेष्ठ है उसी प्रकार सब भवों में मनुष्य भव श्रेष्ठ है।

सम्पूर्ण लोक में श्रेष्ठ एवं समस्त सुख देने वाला धर्म मनुष्य शरीर से ही किया जा सकता है। इस कारण से मनुष्य शरीर ही सर्वश्रेष्ठ है। अभी भी कषायों, क्लेशों से छुटकारा देने वाला मनुष्य जन्म प्राप्त कर धर्म धारण नही किया तो फिर दुर्गतियों में भ्रमण करना पड़ेगा।

जिस प्रकार समुद्र में गिरा रत्न मिलना दुर्लभ है उसी प्रकार मनुष्य जन्म एक बार मिलने के बाद पुनः मिलना दुर्लभ है, इसलिए मनुष्य भव से मिलने वाले स्वर्ग, मोक्ष आदि फल प्राप्त करने का पुरुषार्थ जरूर करना चाहिए।

अनंत सागर
अंतर्भाव
इकचालीसवां भाग
12 फरवरी 2021, शुक्रवार, बांसवाड़ा

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