माता ही है प्रथम गुरु

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भीलूड़ा 18 मार्च ।
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के सानिध्य दिगंबर जैन मंदिर भीलूड़ा में चल रहे पंचामृत अभिषेक शांतिधारा और नित्य प्रवचन के तहत गुरुवार को मुनि श्री ने प्रवचन में कहा कि माता ही प्रथम गुरु है। माता को ही शास्त्रों में पहला गुरु माना है। उसके बाद किसी अन्य को गुरु का दर्जा दिया गया है।
मुनि श्री ने कहा कि जैन धर्म में पहले से ही एक इंद्रिय जीव और पंच इंद्रिय जीव में समान आत्मा मानी गई है। इससे सिद्ध होता है कि जैन धर्म में हमेशा से ही स्त्री पुरुष को समानता का दर्जा दिया गया है। स्त्री और पुरुष में अंतर बताते हुए उन्होंने कहा कि स्त्री ही घर को घर बनाने का काम करती है। वही बच्चों में संस्कार डालती है। वह घर को स्वर्ग बनाने का काम करती है।
मुनि श्री ने कहा कि शास्त्रों के अनुसार पुरुष के 14 व स्त्री के 12 शृंगार बताए गए हैं लेकिन हम पाश्चात्य संस्कृति के अनुसार चलते जा रहे हैं, जो कि दुखद है। हमें अपनी संस्कृति बचानी चाहिये नही तो आगे बहुत कठिन समय आने वाला है। महिलाओं की वीरता के बारे में उन्होंने लक्ष्मीबाई का उदाहरण देकर समझाया कि परिस्थिति अनुकूल नहीं होने पर भी लक्ष्मीबाई ने वीरता का परिचय दिया। ऐसे कई उदाहरण शास्त्रों में और इतिहास में बताए गए हैं। मुनि श्री ने बताया कि हमें दूसरों की शक्तियां पहचानने से पहले अपने अंदर निहित शक्तियों को पहचानना चाहिए।

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