‘अर्थ के ऐसे नियम जो धर्म-कर्म संवार दें!!’ अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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गृहस्थ श्रावक जीवनयापन हेतु धनोपार्जन करने के लिए कृषि, व्यापार आदि कर्म करता है। यह सत्य है की इनके बिना गृहस्थ जीवन चल भी नहीं सकता है। क्योंकि गृहस्थ जीवन को चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती है। धन कमाने के लिए नौकरी, व्यापार आदि करना ही होगा। इन सब को करने में शीलभंग (अर्थात् मन कर्म वचन वाणी से ऐसा कृत्य जो किसी को कष्ट पहुँचाए) तो होना तय है, फिर क्या पाप लगेगा? यह प्रश्न सदैव अनेक लोगों के मन में बना रहता है। किन्हीं के मन में यह भी चलता रहता है की पूजन आदि करते समय भी जो हिंसा होती है तो क्या उसका पाप भी लगता है? कोई यह भी कहता है पैसा नहीं कमाएंगे तो दान कैसे देंगे? कई ऐसे प्रश्न और उलझनें हैं जो इंसान के अंदर ही अंदर घूमती रहती हैं। इन्हीं उलझनों में उसका जीवन तो निकलता ही है और सारा कलेश उसके अंदर ही रह जाता है। इस उलझन के कारण वह जीवन में धर्म करते हुए भी उसके फल का भोग नहीं कर पाता है। क्योंकि उलझन और नासमझी में किए धार्मिक अनुष्ठान का भी फल नहीं मिलता है। तो चलिए जानते हैं की, तीर्थंकरों में एक श्रावक के लिए किस प्रकार से हिंसा का उपदेश दिया गया है। तीर्थंकर भगवान ने संकल्पी, आरंभी, उद्योगी और विरोधी यह चार तरह की हिंसा बताई हैं। इनमें से गृहस्थ श्रावक के लिए एक ही हिंसा का त्याग बताया है। संकल्पी हिंसा का मतलब किसी जीव को संकल्प के साथ नहीं मारूँगा। धर्म-कर्म के साथ जीवनयापन में बाकी तीन प्रकार की हिंसा में पाप नहीं लगता है। क्योंकि परिवार के लिए धनोपार्जन करने में प्राणी के मन में कषाय, वासना आदि का भाव नहीं आता है। भोगों के साथ जीवन यापन करने वालों को चारों हिंसा का पाप लगता है। क्योंकि वहाँ पर कषाय, वासना आदि के भाव भी होंगे। धर्म-कर्म करते समय जो पाप हो जाता है, उनके लिए ही तीर्थंकर भगवान ने प्रायश्चित स्वरूप प्रतिदिन जिनेन्द्र पूजा, गुरुओं की आराधना और भगवान की वाणी का श्रवण करना, दया, करुणा के भाव से प्राणी मात्र में सहयोग का भाव रखना और गुरुओं से प्रायश्चित लेने का विधान कहा है। जो इस भाव से व्यापार कर रहा है कि व्यापार करूँगा तभी तो दान दूँगा? अक्षमता के अलावा यह सोच तब ठीक नहीं है जब वह अति महत्वाकांक्षा अथवा लोभ के चलते व्यापार कर रहा है। तीर्थंकर भगवान ने कहा है कि, जो कमाया है उसी में से दान करो। दान करने लिए व्यापार मत करो। सहज व्यापार से जो कमाया उसमें से दान करो, यह करने से अधिक आनंद आएगा।
जीवनयापन के अतिरिक्त आज महत्वाकांक्षा, लोभ और प्रतिस्पर्धा के कारण व्यापार तो बढ़ता जा रहा है, पर धर्म-कर्म कम हो गया है। और जहाँ धर्म कर्म हो भी रहा है वहाँ डर,परम्परा और सांसारिक भोगों की इच्छा की पूर्ति के उद्देश्य से किया जा रहा है। श्रद्दा और आस्था से तो कम लोग ही इसमें रुचि ले रहे हैं। कुल मिलाकर भोग या इच्छाओं की पूर्ति के लिए, दिखावे के लिए और अति महत्वाकांक्षा में जीवन शैली के स्तर को बढाने के उद्देश्य से धन कमाया जा रहा है।
इसी कारण से परिवार छोटे-छोटे होते जा रहे हैं। वृद्धाआश्रम बढ़ते जा रहे हैं। अब घरों में नानी-दादी की तरह कहानी सुनाने वाला कोई नहीं होता है। घर मे अशांति, मानसिक तनाव,अपनापन, प्रेम,स्नेह और एक दूसरे के प्रति सम्मान समाप्त होता जा रहा है। लज्जा-शर्म घरों से निकलती जा रही है। कुल मिलाकर लोग एक दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। यह सब बिना धर्म के धन कमाने की चाह के कारण हुआ है। बस अब इंसान के दिमाग में धन रहा गया है।
  इसी कारण से छोटी छोटी बातों में घर बिखर रहें हैं। मत-भेद के साथ मन-भेद बढ़ता जा रहा है। यह कह सकते हैं कि धन है; पर धन का सुख नहीं है। यह एक प्राचीन तथ्य है कि धन का सुख तो धर्म के साथ ही है। बिना धर्म के कमाया धन नाश का कारण बनता ही है।


भारतीय जैन संस्कृति के अनुसार धर्म से परिवार, समाज और देश सुगमता से चलते हैं। यह काल का भी प्रभाव है कि केवल धन से धर्म,परिवार, और समाज चलाया जा रहा है। यही कारण है कि हमारी संस्कृति में विकृति आ गई है और फिर इसी के फलस्वरूप जीवन यापन में विकृति आना स्वाभाविक है। इसका परिणाम दैनिक जीवन में से तीर्थंकरों के उपदेश विलुप्त होते जा रहे हैं। तीर्थंकर भगवान ने कहा कि कमाए हुए धन के चार भाग करने चाहिये। जिसमें से पहला भाग – जमा रखना चाहिए, दूसरा भाग – व्यापार में लगा देना चाहिए, तीसरा भाग – धर्म में लगाना चाहिए और चौथा भाग – अपने कुटुम्ब औऱ परिवार के लिए खर्च करना चाहिए। ऐसा नहीं करने पर, कमाया हुआ धन अधिक से अधिक दस वर्ष में नष्ट हो जाता है और 11वे वर्ष में सब कुछ समाप्त हो जाता है। धर्म में धन की तीन गति बताई गई हैं- दान, उपभोग और नाश। दान में धन कई गुना बढ़ता है। उपभोग से इसी भव्य में सुख मिलता है और अगले भव्य में दुख मिलता है। नाश का मतलब है रखे-रखे धन का नाश होना अर्थात् कमाने वाला ही चला जाता है। सार यही है की, इंसान को यह समझ कर ही धन कमाना चाहिए की वह अपना जीवन धर्म और कर्म में संतुलन के साथ बिता सके, ऐसा करने वाली ही प्रभु का सच्चा भक्त हो सकता है।

अनंत सागर

श्रावक (तीसरा भाग)

20 मई, बुधवार 2020, उदयपुर

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