भाग सत्रह : मुनि देवेंद्रकीर्ती स्वामी से ली थी सातगौड़ा ने पहली बार क्षुल्लक दीक्षा – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantशांति कथा

अभी तक हम सातगौड़ा के ग्रहस्थ जीवन के व्यक्तित्व को जान रहे थे। अब हम उनके संयम जीवन के व्यक्तित्व को जानेंगे। सातगौड़ा के 41 वर्ष पूर्ण होने पर दीक्षा लेने का सुअवसर आ ही गया। उसे समय वह कर्नाटक में विहार कर रहे थे। मुनि देवेंद्रकीर्ती स्वामी से उत्तूर नामक गांव में विक्रम संवत् 1972 (सन 1915) ज्येष्ठ सुदी त्रयोदशी को सातगौड़ा ने क्षुल्लक दीक्षा ली और क्षुल्लक शांतिसागर नाम पाया। क्षुल्लक शांतिसागर महाराज का पहला चातुर्मास कोगानोली में हुआ । क्षुल्लक शांतिसागर महाराज के भाव इतने निर्मल थे कि वह जब गिरनार की यात्रा पर गए तो वहां पर पांचवीं टोक की वंदना करते हुए भगवान नेमिनाथ के चरणों की वंदना करते हुए स्वयं ही क्षुल्लक से ऐलक हो गए। अब क्षुल्लक शांतिसागर ऐलक शांतिसागर बन गए । अब ऐलक वापस मुनि देवेंद्रकीर्ती स्वामी के पास पहुंचे और उनसे मुनि दीक्षा देने का निवेदन किया। मुनि देवेंद्रकीर्ती स्वामी ने क्षुल्लक शांतिसागर महाराज की वैराग्य की भावना को देखते हुए विक्रम संवत 1976(सन 1911) फाल्गुन शुक्ल ग्यारस, बुधवार को यरनाल ग्राम में उन्हें मुनि दीक्षा प्रदान की और अब ऐलक शांतिसागर मुनि शांतिसागर हो गए। समाज ने विक्रम संवत् 1981( सन 1924) अश्विन शुक्ल ग्यारस को समडोली महाराष्ट्र में उन्हें आचार्य पद दिया और उसके बाद आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की निर्दोष चर्या और साधना के साथ संयम, त्याग की कठिन चर्या देखते हुए विक्रम संवत 1994 (सन 1937) में गजपंथा, महाराष्ट्र में चारित्र चक्रवर्ती पद आचार्य शांतिसागर महाराज को समाज ने दिया। यह था आचार्य श्री शांतिसागर महाराज के संयम की ओर बढ़ते कदमों से छोटा सा परिचय। आगे हम आपको इसी प्रकार उनके संयम जीवन के व्यक्तित्व से नए-नए पहलुओं से परिचित करवाएंगे।

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