मुनियों के प्रति नकारात्मक सोच न हो – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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किसी ना किसी घटना, कार्य से हमें प्रेरणा मिलती है। पद्मपुराण के पर्व 92 में एक प्रसंग आया है जिससे हमें प्रेरणा लेनी चाहिए कि मुनियों के लिए कभी भी नकारात्मक सोच को जन्म नहीं देना चाहिए। तो आओ, जानते हैं क्या है प्रसंग…

सप्तर्षि मुनिराज श्री सुरमन्यु, श्रीमन्यु, श्रीनिचय,सर्वसुन्दर,जयवान,विनयललसा और जयमित्र जहां पर ध्यान-तप करते थे, वहां से आकाश मार्ग के माध्यम से दूर दूर तक आहार करने जाते थे। एक बार वह आहार करने अयोध्या नगरी आए। आहार के लिए भ्रमण करते-करते वे अर्हद्दत सेठ के घर पहुंच गए। उन मुनियों को देखकर अर्हद्दत सेठ ने विचार किया कि
वर्षायोग (चातुर्मास)  में ये मुनि कहां से आ गए। आसपास तो ये मुनिराज थे नहीं। ये मुनि आगम (शास्त्र) के विरुद्ध चल रहे हैं, ज्ञान से रहित और आचरण से भ्रष्ट हैं, इसलिए यहां घूम रहे हैं। असमय में आए मुनियों को अर्हद्दत सेठ की वधु ने  आहार करवाया। आहार के बाद मुनिराज मंदिर गए। वहां पर उन्हें द्युति भट्टराक ने देखा तो उन्होंने खड़े होकर मुनियों को नमस्कार किया और विधि के साथ पूजा की। द्युति भट्टराक के शिष्य विचार करने लगे कि हमारे आचार्य चाहे जिसकी वन्दना करते रहते हैं, इस विचार से द्युति भट्टारक के शिष्यों ने सप्तर्षि मुनियों की निन्दा करने का विचार किया। सप्तर्षि मुनि जिनेन्द्र भगवान के दर्शनकर आकाश मार्ग से अपने स्थान को चले गए। द्युति भट्टारक के शिष्यों को जब उनके सप्तर्षि होने का ज्ञान हुआ तो शिष्यों ने अपनी निन्दा करते हुए अपने भावों को पवित्र किया। उधर, मुनियों के सप्तर्षि होने की बात जब अर्हद्दत सेठ को पता चली तो वह भी पश्चाताप करने लगा। वह कहने लगा-यथार्थ अर्थ को नहीं समझने वाले मुझ मिथ्यादृष्टि को धिक्कार हो, मैं पापी हूं, पापकर्मी हूं,पापात्मा हूं, इस पापकर्म का प्रायश्चित उन मुनियों के दर्शन के अलावा कुछ नहीं हो सकता है।
तो देखा आपने, बिना कुछ सोचे-समझे हम कैसे पापकर्म कर लेते हैं। यह तो आप समझ ही गए होंगे कि हमें कभी भी किसी व्यक्ति के बारे में जाने बिना कुछ भी विचार प्रकट नहीं करना चाहिए।

अनंत सागर
प्रेरणा
10 जून 2021, गुरुवार
भीलूड़ा (राज.)

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