भाग तीन : निस्पृहता से परिपूर्ण था सातगौड़ा का जीवन – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantशांति कथा

भाग 2 में हमने आपसे बात की थी सातगौड़ा के परिवार के बारे में और आज हम चर्चा करेंगे उनके व्यक्तित्व की। एक ज्योतिषी ने पहले ही यह भविष्यवाणी की थी कि यह बालक धार्मिक और संस्कारित निकलेगा। यह बात सार्थक भी हुई।

18 वर्ष की आयु में मुनि बनने के भाव थे लेकिन परिवार का वातावरण अनुकूल नहीं होने से वह दीक्षा नहीं ले सके लेकिन उनका मन वैराग्य से ओत-प्रोत था। परिस्थिति चाहे जैसी भी थी सातगौड़ा ने अपना मनोबल कम नहीं किया और घर में रहते हुए भी 18 वर्ष की आयु में पलंग और गद्दे पर सोने का त्याग कर जमीन पर चटाई बिछाकर सोना शुरू कर दिया। माता-पिता ने शादी के लिए कहा तो सातगौड़ा ने कड़क आवाज में उत्तर दिया कि वह आजीवन ब्रह्मचारी रहेंगे। इसके बाद 25 वर्ष की आयु में पादुका का त्याग कर दिया तो 38 वर्ष में घी, तेल का त्याग दिन में एक बार भोजन-पानी का नियम ग्रहण कर लिया। त्याग के प्रभाव से सातगौड़ा का जीवन वैराग्य में रम गया और वह अपने सगे भाई -बहन की शादी तक में नहीं गए। सातगौड़ा की दिनचर्या में स्वाध्याय, सामयिक, अभिषेक, पूजन, मुनि को विहार करवाना, उनका कमंडल लेकर चला और संतों की सेवा करना शामिल था। वह कपड़े की दुकान पर बैठते थे, उस समय कोई कपड़ा लेने आता तो कहते थे, जितना कपड़ा चाहिए अपने हाथ से माप लो और जितने पैसे बनते हैं, उतने पेटी में डाल दो। इतनी निस्पृहता उनके जीवन में थी। आगे हम फिर उनके व्यक्तित्व की बात करेंगे।

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