परिग्रह परिमाण व्रत का करें पालन – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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बच्चों कल भगवान महावीर का निर्वाणोत्सव है। महावीर का सम्पूर्ण उपदेश परिवार, समाज और देश को जोड़ने के लिए था।
आज हम उन्हीं उपदेशों में एक ऐसे उपदेश की बात करेंगे जिसके कारण हम कम संसाधनों में भी संसारिक जीवन को खुशियों के साथ जी सकते है और परिवार, समाज व देश को संगठित कर सकते हैं। अपसी प्रेम, वात्सलय बढ़ा सकते हैं। अमीर-गरीब का भेद मिटा सकते हैं। वह उपदेश हैं परिग्रह परिमाण व्रत, हम इसे अपरिग्रह व्रत भी कह सकते हैं। भगवान महावीर ने कहा था कि जीवन जीने के लिए जितनी वस्तुओं की आवश्यकता है उतना रखो बाकी का त्याग कर दो, इसी का नाम है परिग्रह परिमाण व्रत है। आज यह उपदेश हमारे जीवन से लोप होता जा रहा है। इसके चलते परिवार, समाज, देश में भय, आतंक, ईर्ष्या, कालाबाजारी, धन आदि के झगड़े और अमीर-गरीब का भेद बढ़ता ही जा रहा है।
हम सब देखते हैं कि परिवार में धन, जमीन आदि के लिए विवाद होते ही रहते हैं। इससे संयुक्त परिवार की परंपरा समाप्त हो गई इसके कारण परिवार में संस्कार और अच्छी संस्कृति का वातावरण भी धीरे धीरे खत्म होते जा रहा है। एक दूसरे की भावनाओं को नही समझा जा रहा है। अब परिवार परिवार नही रहे ऐसा लगता है कि एक होटल के कमरे में अलग अलग रह रहे है। न तो प्रेम रहा न वात्सलय। सब की निगाहें एक दूसरे के धन आदि पर लगी हुई हैं। समाज में छोटे बड़े, अमीर-गरीब का भेद बढ़ता ही जा रहा है। हम एक दुसरों को गलत साबित करने लगे रहते हैं। धर्म का काम भी ईर्ष्या से करते है। देश मे कालाबाजारी, महंगाई, अधिक उत्पादन की इच्छा में क्वालिटी का खराब होना, धन के लालच में अधिक संग्रह कर वस्तुओं को अधिक कीमत में बेचना यह सब हम देख रहे हैं। पर अगर महावीर की परिग्रह परिमाण व्रत उपदेश का पालन होने लगे तो परिवार, समाज और देश में यह यह सब समाप्त हो जाए। इसलिए बच्चों आज कुछ शिक्षा लेना है तो यह शिक्षा लो कि हम समाज, परिवार और देश में भगवान महावीर के जीवन परिचय को जन जन तक पहुचाएंगे। महावीर के परिग्रह परिमाण व्रत को जीवन में उतारने के साथ जन जन तक पहुचाएंगे, तभी महावीर के सपनों का संसार तैयार हो सकता है।

अनंत सागर
पाठशाला
(उनतीसवां भाग)
14 नवम्बर 2020, शनिवार, लोहारिया

अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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