आर्त्तध्यान -अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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पाठशाला में आज बात करेंगे आर्त्तध्यान की । आर्त्त का मतलब है-पीड़ा या दुःख । प्रिय मनुष्य या वस्तु के वियोग और अप्रिय मनुष्य या वस्तु के संयोग से होनेवाली मानसिक विकलता की स्थिति में जो चिन्तन होता है,वह आर्त्तध्यान कहलाता है । वेदनाजनित आकुलता और विषयसुख की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला दृढ़ संकल्प भी इसी ध्यान का अंग है । व्याकुलता,छटपटाहट और अधीरता आर्त्तध्यान की निष्पत्तियां हैं । आर्त्तध्यान के चार भेद हैं ।

इष्टवियोग: प्रिय मनुष्य या वस्तु के वियोग होने उसकी प्राप्ति के लिए होनेवाली वियोगजन्य विकलता ।

अनिष्टसंयोग: अप्रिय मनुष्य या वस्तु के संयोग होने पर से दूर करने के लिए होने वाली संयोगजन्य विकलता ।

पीड़ा चिंतन: वेदनाजन्य आतुरता,छटपटाहट ।

निदान: भावी भोगों की आकांक्षाजन्य आतुरता ।

अनंत सागर
पाठशाला (त्रेपनवां भाग)
1 मई,शनिवार 2021
भीलूड़ा (राज.)

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