भाग दस : पिता के प्रति अनुराग के चलते नहीं ली 17-18 वर्ष की उम्र में दीक्षा – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantशांति कथा

सातगौड़ा जब  9 वर्ष के थे, तभी माता-पिता ने उनकी शादी 6 वर्ष की एक बालिका के साथ कर दी थी। किन्हीं कारणों से बालिका का छ: महीने के अंदर ही मरण हो गया, वहीं सातगौड़ा ने भी कभी उस बालिका को अपनी पत्नी नहीं माना। पहले बाल विवाह प्रचलन में था, जैसे गांधी जी की शादी भी 13 वर्ष की आयु में हो गई थी। सातगौड़ा जन्म से ही ब्रह्मचर्य का पालन करते आ रहे थे। जब माता पिता ने 17- 18 वर्ष की आयु में दोबारा शादी करने को कहा तो सातगौड़ा ने मना कर दिया, क्योंकि वे तो दीक्षा लेना चाहते थे। लेकिन तब दीक्षा न लेने के पीछे उनका अपने पिता के प्रति अनुराग था। सातगौड़ा के पिता ने उनसे कहा था कि जब तक मैं जीवित हूं, तुम दीक्षा मत लेना। तुम घर से चले जाओगे तो मुझे संक्लेश होगा। उस समय सातगौड़ा ने सोचा कि योग्य पुत्र तो वही है, जो पिता को  क्लेश न होने दे। बस इसी भावना के चलते सातगौड़ा ने 17-18 वर्ष की उम्र में दीक्षा नहीं ली । पिता की आज्ञानुसार सातगौड़ा घर पर ही रहे और यहीं आध्यात्म में रुचि लेने लगे। घर पर ही पूरा दिन स्वाध्याय करते और दूसरों को भी करवाते थे । सातगौड़ा के पास वेदांती लोग धर्म की चर्चा करने आते थे। सातगौड़ा के उपदेश के प्रभाव से उनके परम मित्र वेदांती रुद्रप्पा भी पानी छानकर कर पीने लगे और रात्रि भोजन का त्याग कर दिया। सातगौड़ा ने रुद्रप्पा को रात्रि में भोजन में पतंगे आदि जीव साक्षात गिरते हुए बताया था। इसी कारण रुद्रप्पा को रात्रि भोजन से विरक्ति हो गई थी। वेदांती रुद्रप्पा कभी-कभी उपवास भी करने लग गए थे। इस प्रकार सातगौड़ा के स्वाध्याय के प्रभाव से अनेक लोगों ने अपनी आत्मा का कल्याण किया।

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