अंतर्भाव : पूर्व में अर्जित कर्मों से मिलते हैं सुख-दुख – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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पद्मपुराण के पर्व 14 में प्रसंग है कि रावण के निवेदन पर रावण के साथ अनेक भव्य प्राणियों को सुवर्णगिरी पर्वत पर विराजमान अनंतबल मुनि राज मनुष्य गति के बारे बताते हैं।

उन्होंने क्या बताया यह आप भी पढ़ें और सुनें।

जो जीव मृदुता और सरलता वाले होते हैं तथा स्वभाव में संतोष रखते हैं वह मनुष्य गति प्राप्त करते हैं। मनुष्य गति में भी जीव मोह के कारण परम सुख के कल्याण के मार्ग को छोड़कर क्षणिक सुख के लिए पाप की क्रिया करता है। जीव अपने पूर्वोपार्जित कर्म के अनुसार ही आर्य (धर्म करने वाला) या मलेच्छ (अर्धम करने वाला) बनता है। इसी तरह कोई धनवान तो कोई गरीब बनता है। कोई धनवान होते हुए भी कुरूप होता है तो कोई रूपवान होकर भी गरीब होता है। कोई दीर्घायु होता है तो कोई अल्पायु होता है। कोई सबको प्रिय होता है और यश को धारण करता है तो कोई अप्रिय होता है और अपयश प्राप्त करता है। कोई आज्ञा देता है तो कोई आज्ञा को पालन करने वाला होता है। इस प्रकार मनुष्य गति में भी सुख-दुख देखे जाते हैं। वास्तव में तो सब दुःख ही है सुख तो कल्पना मात्र है।

इस प्रकार का चिंतवन करेंगे तो मनुष्य गति की वास्तविकता की जानकारी होगी।

अनंत सागर
अंतर्भाव
पैंतालीसवां भाग
5 मार्च 2021, शुक्रवार, भीलूड़ा (राजस्थान)

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