तीसरा दिन : प्रतिकार से तो बढ़ता है संक्लेश – अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantचिंतन, मौन साधना

मौन साधना के तीसरे दिन उपवास कर अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने जब अपनी स्वयं की गलती को स्वीकार किया तो उनकी आंखें नम हो गईं। तो ऐसे में उन्होंने एक नया संकल्प जीवन में लिया। जानें क्या थी वह गलती और क्या है संकल्प।
मैंने जन्म से लेकर अभी तक कई पाप किए हैं, मुझे यह कहने में आज कोई हिचक नहीं। उनमें से कई पापों का फल भी भोग लिया है और कई का भोगना शेष है। इनका अंत तो मोक्ष प्राप्ति पर ही होगा। मैं साधु होकर कर भी पूर्णरूप से अपने आप को यह नहीं समझा पाया हूं कि मैं स्वयं ही इन सुखों और दुःखों का कारण हूं, कोई दूसरा नहीं। यह नहीं समझने के कारण ही तो मैंने किसी को तो अपना माना और किसी को पर्याय। इसी वजह से मैंने अपने आसपास कहीं तो अपने निंदक और कहीं प्रशंसक बना लिए हैं। मैं इसी में लच्छा कर अपनी प्रतिभा और आत्मशक्ति बिना प्रयोजन के कार्यों में लगाता आ रहा हूं। आज मुझे इसे बात का एहसास और अनुभव हो गया है कि मेरे प्रशंसक और निंदक दोनों ने मुझे दुख दिया है। प्रशंसक ने विश्वास तोड़कर और निंदक को तो मैंने पहले ही दुःख का कारण मान ही लिया था। मैंने इन दोनों को दुःख का कारण इसलिए कहा कि जो मेरे प्रशंसक थे, उनमें से कई अब मेरी निन्दा कर रहे हैं और जो निंदक थे उनमें से कई मेरी आज प्रशंसा कर रहे हैं। मैंने बिना वजह निंदक से द्वेष किया और प्रशंसक से राग कर अशुभ कर्मों का बन्ध कर पाप का संचय किया। आज मुछे रोना भी आया कि क्यों मैंने यह किया।
अब मैं संकल्प करता हूं कि अब मैं अपने कर्मों पर ध्यान दूंगा। कौन क्या मेरे लिए सोचता है, उसे सोचने दें, उससे मेरे कर्मों पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। फर्क तो तब पड़ेगा जब सामने वाले का प्रतिकार करूंगा। अब प्रतिकार नहीं, आत्मचिंतन करूंगा कि मेरे आसपास का जैसा भी वातावरण होगा, उसमें अपने आपको सहज रखूंगा। आज मुझे ध्यान में इस बात का एहसाह भी हुआ है कि प्रतिकार से तो संक्लेश बढ़ता है और संक्लेश ही मन, मस्तिष्क को मलिन कर दुःख के कारणों को जन्म देता है।
(7 अगस्त 2021)

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