प्रेरणा :- ‘घृणा नहीं प्रेम से जीतें दूसरे का मन’-अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

label_importantप्रेरणा

छोटे भाई ने अपने बड़े भाई से कहा कि तुम मुझे मेरी 10 कमियां बताओ जिसके कारण घर मे क्लेश,अशांति होती है। मैं उन कमियों को सुधारना चाहता हूँ। एक अच्छा भाई बनकर रहना चाहता हूं। एक व्यक्ति दूसरे की 10 तो क्या हजारों कमियां निकाल सकता है। बड़ा भाई असमंजस से पड़ गया कि क्या कमियां बताऊँ। उसने अपने छोटे भाई से कहा कल सुबह बताता हूं। सुबह होते ही बड़ा भाई दुकान चला गया। उसने बाजार से अपने भाई के लिए 10 गुलाब के फूल खरीदे और फूलों के साथ एक पत्र छोटे भाई के पास भेजा। फूल वाला घर पहुंचा और छोटे भाई को फूल व पत्र दे दिया ।
पत्र को पढ़ने के बाद उसकी आँखों मे आंसू आ गए। वह अपने आप से घृणा करने लगा। उसके मन-मस्तिष्क में भाई के लिए प्रेम,वात्सलय उमड़ आया। ऐसा क्या बड़े भाई ने पत्र में लिख दिया कि कुछ ही क्षण में घर में शांति का माहौल हो गया?
उस पत्र में बड़े भाई ने लिखा था कि मुझे तुम्हारी 10 कमियां नही मालूम। तुम जैसे हो मेरी लिए वैसे ही अच्छे हो। तुम जैसा मेरे लिए सोचतो हो वह सोचते रहो। मेरे साथ जैसा व्यवहार करते हो करते रहो। मुझे तो तुममें कोई कमी नही दिखाई देती। तुम मेरे छोटे भाई हो तो मैं तुम्हारी कमी कैसे देख सकता हूं। मुझे तो इस बात की खुशी है कि तुम मेरे कारण खुश हो । शाम को जब बड़ा भाई आया तो छोटा भाई बडे भाई के चरणों को पकड़ के रोने लगा। अपने आप को दोषी कहने लगा। उसने अपने मन के सारे नकारात्मक विचार निकाल दिए। घर में दीवाली जैसे माहौल हो गया और रोज दीवाली जैसे लगने लगा। इस कहानी से प्रेरणा मिलती है कि कभी किसी की कमियां देखकर अपने विचारों को, मन मस्तिष्क को कचरे का डिब्बा नही बनाएं। दूसरों के गुणों को देखकर अपने मन मस्तिष्क को हीरों की तिजोरी बनाएं। दूसरे के मन को घृणा से नही प्रेम से जीता जा सकता है।

अनंत सागर प्रेरणा
(तेईसवां भाग)
8 अक्टूबर, गुरुवार 2020, लोहारिया
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

Related Posts

Menu