राम की प्रार्थना – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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पद्मपुराण पर्व अस्सिवाँ में वर्णन आया है कि रावण के शरीर का अग्निसंकार के बाद राम-सीता ने स्नेहीजनों के साथ लंका में प्रवेश किया। उन्होंने श्रावक का पहला धर्म देव दर्शन की पालना करते हुए सबसे पहले श्री शांतिनाथ मंदिर में प्रवेश किया, जहां बैठकर रावण ने बहुरूपिणी विद्या सिद्ध की थी। वहां विराजमान श्री 1008 शांतिनाथ भगवान के दर्शन किए। राम ने भी श्री 1008 शांतिनाथ भगवान की स्तुति की थी, कैसे की थी, आओ जानते हैं।

मंदिर में प्रवेश करते ही सबसे पहले भगवान के सामने हाथ जोड़े। जिनका हृदय शान्त, निर्मल था, ऐसे  राम ने पाप को नाश करने वाली स्तुति पाठ करते हुए कहा कि भगवान आप के जन्म लेते ही संसार में शांति छा गई, कि आपका जन्म सब रोगों को नाश करने वाला था तथा चारों और ज्ञान का प्रकाश हो गया था। आपके जन्म होते ही इंद्र का आसन कंपायमान हुआ था, जिससे इंद्र को ज्ञात हुआ कि आप का जन्म हुआ। इंद्र अपने परिवार सहित धरती पर आए और आप को प्रणाम कर मेरु पर्वत पर ले जाकर जन्माभिषेक किया। राज्यावस्था में आपने बाह्य चक्र के माध्यम से सभी शत्रुओं को जीत लिया था और मुनि अवस्था में ध्यानरूपी चक्र के द्वारा अंतरंग कर्म रूपी शत्रुओं को जीत लिया था और मोक्ष को प्राप्त हुए थे। जिन्होंने उपमा रहित, नित्य शुद्ध, आत्माश्रय, उत्कृष्ट और अत्यंत दुरासद निर्वाण का साम्राज्य प्राप्त किया था, जो तीनों लोक की शांति के कारण थे, जो महा ऐश्वर्य से सज्जित थे तथा जिन्होंने अनन्त शांति प्राप्त करने में सफलता पाई।

ऐसे शांतिनाथ भगवान के लिए मेरा मन, वचन, काया से नमस्कार हो। आप संसार के समस्त प्राणियों को शरण देने वाले हो। आप ही सब की रक्षा करने वाले हो। आप ही गुरु हो, बन्धु हो, प्रेणता हो, परमेश्वर हो, आप चारों निकायों सहित इंद्र द्वारा पूजित हो। आप धर्मरूपी तीर्थ के कर्ता हो, जिससे भव्य जीव मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रकार अनेक गुणगान भगवान के राम ने किए। शांतिनाथ भगवान की तीन प्रदीक्षणा दी। राम जब स्तुति कर रहे थे, तो सीता, लक्ष्मण, विशल्या, सुग्रीव, भामण्डल, हनुमान आदि भी भगवान की स्तुति करने में तत्पर थे।

अनंत सागर
श्रावक(त्रेपनवां)
5 मई 2021,बुधवार
भीलूड़ा (राज.)

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