भाग इकतालीस : सात व्यसनों और पांच पापों को छोड़कर राजा को करना चाहिए शासन-आचार्य शांतिसागर महाराज

label_importantशांति कथा

एक बार सांगली राज्य के अधिपति श्रीमंत राजा साहब आचार्य शांतिसागर महाराज के दर्शन के लिए आए। आचार्य श्री ने सच्चे धर्म का स्वरूप बताते हुए राजधर्म पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब रामचंद्र, पांडवों ने राज्य किया था तो तुम उनका चरित्र देखो। जब दुष्ट राज्य पर आक्रमण करें तो शासक को रोकना पड़ता है लेकिन एक राजा को कभी दूसरे राज्य पर आक्रमण अपना राज्य बढ़ाने के लिए नहीं करना चाहिए। उसे निरपराध प्राणी की रक्षा करनी चाहिए। राजा का कर्तव्य है कि वह संकल्पी हिंसा बंद करे। न शिकार खेले और न ही किसी और को खेलने दे। देवताओं के आगे जीव की बलि बंद कराना उसका परम धर्म है। जुआ, मांस, सुरा, वेश्या, आखेट, चोरी, परांगना, परस्त्री के सेवन रूपी ये सात व्यसन हैं। इन सभी महापापों को रोकना शासक का कर्तव्य है। राजनीति में राजा को अपने पुत्र को भी दंड देने से हिचकिचाना नहीं चाहिए। उन्होंने कहा कि सज्जन का पालन करना और दुर्जन का शासन करना राजनीति है। एक राजा को हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और अतिलोभ, इन पांच पापों का त्याग कर धर्म का पालन करना चाहिए। अधर्म को ही अन्याय कहते हैं। जिस राजा के शासन में प्रजा नीति से चले, उस राजा को पुण्य प्राप्त होता है। अनीति से राज्य करने पर उसे पाप प्राप्त होता है। महाराज श्री ने कहा कि राजनीति तो यह है कि राजा या शासक राज्य भी करे और पुण्य भी कमाए।

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