सच्चे गृहस्थधर्म का कर्तव्य – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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सच्चे श्रावक का मन सदैव धर्म में रहता है। शुभकार्य का संकेत मिलने पर वह पहले खुद को जिनेन्द्र भगवान के पूजन, उनकी आराधना में लगाता है। पद्मपुराण के पर्व 95 में सीता के जीवन का एक प्रसंग आता है, आओ जानते हैं क्या है वह प्रसंग..

सीता सो रहीं थीं तो रात्रि के पिछले पहल के उसे स्वप्न आए। पहला स्वप्न आया कि दो अष्टापद उसके मुंह में प्रवेश कर रहे हैं। दूसरा स्वप्न में देखा कि वह पुष्पक विमान के शिखर से गिरकर नीचे पृथ्वी पर आ पड़ी है। सुबह की दैनिक क्रिया सम्पन करने के बाद सीता अपनी सखियों के साथ राम के पास गईं। सीता ने राम को स्वप्न के बारे में बताया। राम ने स्वप्नों का फल बताते हुए कहा कि पहले स्वप्न का फल है, तुम दो सुंदर पुत्रों को जन्म दोगी। दूसरे स्वप्न का फल अशुभ है। चिन्ता की बात नहीं है क्योंकि शांतिकर्म तथा दान से पापग्रह शांति को प्राप्त हो जाएंगे। राम में सीता से उनकी इच्छा पूछी। तब सीता ने कहा-  है नाथ, मैं पृथ्वी पर स्थित अनेक चैत्यालयों के दर्शन करना चाहती हूं। पंचवर्ण की जिनप्रतिमाओं को नमस्कार करने का भाव है। स्वर्ण, रत्नमयी पुष्पों से जिनेन्द्र भगवान की पूजा करूं, यह मेरी बड़ी श्रद्धा है। इसके सिवाय और क्या इच्छा करूं। राम ने द्वारापालिनी से कहा, बिना विलम्ब किए मंत्री से जाकर कहो कि जिनालयों में अच्छी तरह विशाल पूजा की जाए । सब लोक, महेन्द्रोदय उद्यान में जाकर जिन मन्दिरों सजावें और पूजन की व्यवस्था करें। तोरण, पताका, लम्बूष, गोले,अर्धचन्द्र,चंदोवा, अत्यन्त मनोहर वस्त्र तथा विधि-विधान से लोग सम्पूर्ण पृथ्वी पर जिन पूजा करें। निर्वाण क्षेत्रों के मंदिर विशेष रूप से सजाए जाएं तथा सर्वसम्पत्ति से सभी कार्य हों। द्वारापालिनी ने अपने स्थान पर दूसरी स्त्री को नियुक्त किया और मंत्री को कहने चली गई। मंत्रियों ने भी राम की आज्ञा का पालन करते हुए सभी धार्मिक कार्य पूर्ण किए। राम ने सीता के साथ महेन्द्रोदय उद्यान की और प्रस्थान किया। वहां पहुचने पर सीता के साथ जिनेन्द्र भगवान की पूजा,आराधना की। कहने का अर्थ यही है कि यही श्रावक का कर्तव्य है। यही सच्चे गृहस्थ धर्म का कर्तव्य भी है।

अनंत सागर
श्रावक
16 जून 2021, बुधवार
भीलूड़ा (राज.)

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