सधर्म ही सच्चा सहारा – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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वर्तमान का समय भागदौड़ और आपा खो देने वाला है। परिवार में पति-पत्नी के बीच मतभेद, मनभेद बढ़ जाते हैं तो न जाने कितने नकारात्मक विचार मन में आकार लेने लगते हैं। पद्मपुराण के पर्व 99 मेंं वर्णित सीता की कथा से शिक्षा लेनी चाहिए कि विचारों में नकारात्मकता नहीं आए।

सेनापति कृतान्तवक्त्र, जब सीता को जंगल में छोड़कर वापस राम के पास आता है, तो वह राम से कहता है कि सीता देवी ने आपसे कहा है कि यदि अपना हित चाहते हो तो जिस प्रकार आपने मुझे छोड़ दिया है, उस तरह से जिनेन्द्र देव में भक्ति नहीं छोड़ना । स्नेह तथा अनुराग से युक्त जो मानी राजा मुझे छोड़ सकता है निश्चय ही वह जिनेन्द्र देव में भक्ति भी छोड़ सकता है। वचनबल को धारण करने वाला दुष्ट मनुष्य बिना विचारे चाहे जिसके विषय में चाहे जो निन्दा की बात कह देता है परन्तु बुद्धिमान मनुष्य को तो उसका विचार करना चाहिए। दूसरे के कहने से जिस प्रकार आपने मुझे छोड़ दिया है, उस प्रकार सधर्म रूपी रत्न को नहीं छोड़ना क्योंकि मेरी अपेक्षा सधर्म रूपी रत्न की निन्दा करने वाले अधिक हैं। हे राम, आपने मुझे भयंकर निर्जन वन में छोड़ दिया है सो इसमें क्या दोष है? परन्तु इस तरह आप सम्यग्दर्शन की शुद्धता को छोड़ने योग्य नहीं हैं क्योंकि मेरे साथ वियोग को प्राप्त हुए आपको इस भव में दुःख होगा परन्तु सम्यग्दर्शन के छूट जाने पर तो भव भव में दुःख होगा। संसार में मनुष्य को खजाना, स्त्री तथा वाहन आदि मिलना सुलभ है परन्तु सम्यग्दर्शन रूपी रत्न साम्राज्य से भी कहीं अधिक दुर्लभ है। इस प्रकार स्नेहपूर्ण चित्त को धारण करने वाली सीता ने जो संदेश दिया है उस पर मनन करना आवश्यक है। इस कथा से यही शिक्षा लेनी चाहिए कि नकारात्मक विचारों से मन में क्लेश का भाव उत्पन्न होता है जिस कारण व्यक्ति जिनेन्द्र देव की भक्ति से भी दूर होता जाता है। कभी भी ऐसा भाव मन में नहीं लाएं जिससे सम्यग्दर्शन रूपी रत्न मिलने में रुकावट आए।

अनंत सागर
कहानी
27 जून 2021,रविवार
भीलूड़ा (राज.)

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