साधना के स्वर और आत्मकल्याण की राह

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48 दिन की मौन साधना के बाद अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज की

जयपुर के वरिष्ठ पत्रकार श्री मनीष गोधा से सीधी बात के सम्पादित अंश

श्री मनीष गोधा: महाराज के चरणों में सादर नमस्ते

त्याग, तपस्या और ज्ञान का धर्म जैन धर्म! और इस जैन धर्म में एक सुदीर्घ परंपरा है ऋषियों की, मुनियों की, महाराज और आचार्यों की। ये मानते हैं कि आत्म कल्याण से ही जगत् का कल्याण हो सकता है। आत्म कल्याण के लिए तपस्या को सबसे बड़ा साधन माना गया है। यह तपस्या शरीर को कष्ट देने के लिए नहीं होती है। तपस्या होती कर्मों की निर्जरा के लिए, खुद के कल्याण के लिए और खुद के कल्याण के साथ जगत् के कल्याण के लिए। आज हमारे साथ हैं मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज और भाद्रपद मास के दसलक्षण धर्म के इस पावन अवसर पर हम इस बात को लेकर आज बहुत गौरवान्वित भी हैं और खुश भी हैं कि महाराज श्री ने 48 दिन की कठोर मौन तपस्या पूर्ण की है।

आज का समय जब हर आदमी कुछ न कुछ बोल रहा है। इतना शोर है पूरी दुनिया में कि आदमी अभी मुंह से ही बोल नहीं रहा है, बल्कि लिख-लिख कर भी बोल रहा है। सोशल मीडिया के जरिए, सब चीजों के जरिए बोल रहा है और हर तरफ एक जबरदस्त शोर है। ऐसे दौर के अंदर मौन साधना शायद सबसे कठिन साधना है। ऐसे ही समय में महाराज श्री ने 48 दिन की मौन साधना पूर्ण की है। आज वह अपनी मौन साधना समाप्त कर रहे हैं। यह हम सबके लिए गौरव विषय है, जबकि महाराज श्री के लिए तो यह बस एक पड़ाव है। उनकी आगे भी और तपस्या हम देखेंगे भी और उसके बारे में सुनेंगे भी। 48 दिन की मौन साधना के दौरान उन्होंने क्या महसूस किया, उनके क्या अनुभव रहे और किस तरह से तपस्या, धर्म और सभी चीजें समाज को क्या दिशा दे सकती हैं, इन्हीं विषयों पर महाराज श्री से बात करेंगे। मुझे लगता है कि महाराज श्री से यह बातचीत अपने-आप में पूरे समाज के लिए मार्गदर्शन का काम करेगी…

तो इसी उद्देश्य के साथ हम बातचीत का यह सिलसिला शुरू करते हैं….

48 दिन की मौन साधना! सबसे पहले तो आपसे यह जानना चाहूंगा कि विचार कैसे आया? ठीक है तपस्या साधु का धर्म है और वह करता भी है। बहुत सारे तरीके हमने देखे हैं उपवास भी किया जाता है, और भी दूसरे तरीके हैं लेकिन मौन साधना का विचार क्यों आया? आपको क्यों लगा कि मौन साधना करनी चाहिए, क्या उद्देश्य था इसके पीछे?

महाराज श्री: मौन साधना का जो विचार या प्रेरणा मुझे मिली, वह आज से 12 वर्ष पहले 2006 में श्रवणबेलगोला में हुए मस्तकाभिषेक से मिली। उसके पहले में ब्रह्मचर्य अवस्था में, मैं वहां के मठाधीश श्री भट्टारक चारूकीर्ति जी के पास रहता था। वे भी अपने जीवन में भक्तामर की 48 दिन की मौन साधना करते थे। उसी समय से मैंने भी पुरुषार्थ चालू किया था। अखंड मौन तो नहीं, लेकिन हर साल 48 दिन की मौन साधना करता हूं, जिसमें कुछ छूट भी रखता हूं बोलने की, लिखने की। पर इन 20 सालों में अभी 10-12 साल हो गए हैं इस बात को। इस बार ऐसी प्रेरणा हुई कि महाराज बनाकर मुनि अवस्था में अखंड मौन रखना चाहिए। क्योंकि जब भी मैं मौन साधना करता था तो एक अनुभूति होती थी कि इससे हम बाहर की बातों से बच जाते हैं। क्योंकि आज जीवन में सबसे बड़ी बात बाहर की बातों से बचना ही है। लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए किसी की बात मुझे कहेंगे, मेरी बात सुनकर किसी को कहेंगे और उनकी बातों को सुनकर हम अपना दिमाग खराब कर लेते हैं। और जब स्वाध्याय करने बैठता या जाप करने बैठता तो वही बातें बार-बार दिमाग में आतीं। तो मैंने सोचा िक मौन साधना के माध्यम से कम से कम 48 दिनों के लिए अपने आप को पहचाने का प्रयास करूं। सोचा कि मौन साधना के माध्यम से कम से कम 48 दिनों के लिए तो अशुभ कर्मों से बच जाऊं, अपने आपको पहचानने का पुरूषार्थ करूं। क्योंकि मौन साधना से बड़ी साधना हमारे जीवन में नहीं है। यही साधना हमें हमारे परमात्मा पद तक ले जाने का साधन है। तो इसकी प्रेरणा मुझे श्रवणबेलगोला की धरती से मिली, स्वामी जी से मिली कि मौन साधना ही वास्तव में आत्मकल्याण की वाहक है।

इस दौरान अनुभव क्या रहा? मतलब 48 दिन तक नहीं बोलना। कम्यूनिकेट करने की जरूरत होती है, बहुत सारी चीजें होती हैं, जो हम कहना चाहते हैं। यह समय भी ऐसा था अर्थात् भाद्रपद मास ऐसा होता है कि जब श्रावक भी यह चाहते हैं कि महाराज का उन्हें सान्निध्य मिले, उनके विचार जानने को मिलें। ऐसे समय में मौन साधना करके आपने उन्हें एक अलग तरह का संदेश दिया है कि प्रवचन करना ही सब कुछ नहीं है। आप मौन से भी लोगों को बता सकते हैं कि आप किस तरह से अपने जीवन को आगे बढ़ा सकते हैं। आपका अनुभव क्या रहा इस विषय में…

महाराज श्री: मनीषजी पहले तो मुझे स्वयं यह तय करना पड़ेगा कि मैं क्या कर रहा हूं? क्योंकि कोई व्यक्ति जब दिगम्बर साधु बनता है तो उस साधु की एक चर्या होती है ..

ज्ञान, ध्यान और तप। ये मुनि का स्वभाव हैं। मुनि को यही करना चाहिए और वास्तव में अगर मुनि अपना आत्म कल्याण करना चाहता है तो उसे ज्ञान, ध्यान से युक्त और विषय आशाओं से रहित होना चाहिए। हम जो बाहर प्रवचन करते हैं या जो अन्य कार्यक्रम करते हैं, उसमें आत्म प्रभावना तो नहीं है। धर्म की प्रभावना हो सकती है, लोगों की प्रभावना हो सकती है, समाज की प्रभावना हो सकती है पर साधु व्यक्तिगत प्रभावना से तो दूर होता है। साधु जब अपनी आत्मा से दूर चला जाता है और प्रपंच में पड़ता है कि अभी यह नहीं हुआ, ऐसा होना चाहिए था। स्वाभाविक बात है संत होने के बाद भी हम हैं संसारी। और संसार के बीच में तो संसारी बातें दिमाग में आती ही हैं पर विषय आषाओं से रहित ज्ञान-ध्यान-तप ही साधु का वास्तविक लक्षण है। इसी साधना को मैंने लक्ष्य बनाकर रखा।

जहां तक श्रावक की चाहना की बात है तो ये तो श्रावक हैं, चट भी इनकी, पट भी इनकी। भई श्रावक के साथ तो ऐसा है कि श्रावक के लिए अच्छा है तो सब अच्छा है, लेकिन इनके लिए खराब है तो महाराजजी खराब हैं। जिन्होंने कभी देखा नहीं हो, उनको आश्चर्य हो सकता है कि मौन साधना कैसे करेंगे। चातुर्मास का शाब्दिक अर्थ ही आत्मकल्याण का पर्व है। चातुर्मास का अर्थ चार महीने आपको अपने आप में रहना है, किसी से कोई लेना-देना नहीं है। चतुर्मास की वास्तविक शास्त्रों में गाथा यही है। संत की भी वास्तव में परिभाषा यही है। यह तो मुझे अपना नाम करना है कि महाराज जी अच्छे प्रवचन करते हैं, महाराज के पास हजारों आदमी आते हैं तो मुझे प्रवचन करना है। यही कड़वा सत्य है और इसे स्वीकार करना होगा क्योंकि जब तक सत्य को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक हम अपनी गलती को सुधार नहीं सकते। मैं मानता हूं कि मौन साधना का यह मेरा अपना पुरुषार्थ था। लोगों को क्या लगा होगा, समाज को क्या लगा होगा, मुझे नहीं पता, पर मुझे बहुत अच्छी अनुभूति हुई।

हमारे यहां तो बहुत अच्छी बात कही गई है… कि भगवान आदिनाथ के पोते मरीची ने अनेक मिथ्या मत चलाए लेकिन फिर भी भगवान आदिनाथ उन्हें भी समझाने नहीं गए। भगवान आदिनाथ ने तीर्थंकर होने के बाद भी उन्हें नहीं समझाया क्योंकि वो अपने आत्मकल्याण में थे। भगवान यह जानते थे कि मैं किसी का कुछ कर नहीं सकता, न किसी का अच्छा कर सकता हूं, न किसी का बुरा कर सकता हूं। मैं निमित्त जरूर बन सकता हूं पर जब उसके कर्मों की निर्जरा होगी तब…और वही मरीची बाद में भगवान महावीर बना। तो जब भगवान आदिनाथ ने अपने पोते को नहीं समझाया तो हम किनको समझाने जाएंगे।

इसके अलावा समाज समझाने से नहीं समझता। धर्म की प्रभावना व्यवहार और चारित्र से होती है। व्यक्ति का चारित्र देखो तो प्रभावना है, व्यक्ति का व्यवहार देखो तो प्रभावना है। प्रवचन सुनने के बाद तो थोड़ी देर बाद कहेंगे अच्छा है, क्या था? वो नहीं पता है और फिर थोड़ी देर बाद अगर मैंने किसी से बात नहीं की तो बाहर जाकर कहेंगे महाराज तो ठीक नहीं हैं, बात ही नहीं करते। तो वह सब स्वार्थ का विषय है और समाज अपने हिसाब से काम करता है पर साधु को वास्तव में आत्म साधना में लीन रहना चाहिए। मौन सबसे बड़ी साधना है और मैंने तो अपने जीवन में संकल्प किया है कि धर्म शब्दों के अलावा मुुंह से दूसरी बात अब नहीं करना है। क्योंकि इतनी अनुभूति अब तक हो चुकी है कि बात पकड़ने वाले बहुत मिलते हैं। कौनसी बात को पकड़ लें और कहां कह दें। आत्मकल्याण की भावना ही प्रधान है और वही साधु को करना चाहिए। समाज को भी साधु से यही अपेक्षा रखनी चाहिए कि साधु ज्ञान-ध्यान-तप करे और वह उसमें सहयोग करे। वह प्रवचन कर रहा है या नहीं कर रहा है, वह बात कर रहा है या नहीं कर रहा है, उन्होंने अपना दर्शन दिया कि नहीं, प्रधान विषय नहीं है। हमारा विषय इतना ही है कि अगर श्रावक घर में बैठकर भी श्रद्धा से नमस्कार कर रहा है तो भी उसे पुण्य का फल मिलता है। यह हमारे शास्त्रों में कहा गया है, जरूरी नहीं है कि वह जाकर के चरण छुएगा, चेहरा देखेगा तो ही उसको पुण्य का फल मिलेगा। वह तो उसकी आकांशा है कि वह तो अंदर जा सकता है मैं नहीं जा सकता हूं। महाराज के पास वह तो बैठ सकता है, मैं नहीं बैठ सकता हूं। लोगों की अपेक्षाएं बहुत हैं। और जितने लोग, उतनी अपेक्षाएं। तो मैं तो एक व्यक्ति, अकेला संत सारे व्यक्तियों की अपेक्षाएं पूर्ण नहीं कर सकता। क्योंकि सबकी अपेक्षाएं अपने-अपने हिसाब से हैं.. सबकी अपेक्षाएं पूरी करने जाऊंगा तो मेरा चारित्र खत्म हो जाएगा। इससे मौन रहना ठीक है।

श्रावक के लिए मौन कितना महत्वपूर्ण मानते हैं?

महाराज श्री: साधु के लिए मौन का अर्थ है मन से, वचन से और कर्म से मौन। लेकिन जहा तक श्रावक के लिए मौन की बात है तो श्रावक का मौन इसमें परिलक्षित होता है कि यदि शत्रु भी हो तो वह उससे मीठी बात करे, प्रेम से बात करे। यही श्रावक का मौन है। वह मौन इसलिए नहीं रह सकता क्योंकि उसे गृहस्थी चलानी है और गृहस्थी भी मीठे से चलाएं, प्रेम से चलाएं, जोर से चिल्ला के न चलाएं। किसी को कड़वा शब्द न कहे, मीठे वचनों में अपनी बात को कहे तो मौन है। लोग यही कहेंगे कि बहुत अच्छा है, व्यक्ति बहुत कम बोलता है वह संत जैसा है। हमने देखा है बहुत सारे व्यक्ति होते हैं जो बहुत कम बोलते हैं। कम शब्दों में अपनी बात को कहना ही मौन है श्रावक के लिए। यह तो हुई वचन की बात है। मन से किसी संत के प्रति, किसी व्यक्ति के प्रति किसी धर्म के प्रति बुरे भाव मन में नहीं लाना भी श्रावक का मन से मौन है।

लेकिन श्रावक चाहता है कि तपस्या का एक अंश उसमें भी आए, उसके भी कर्म की निर्जरा हो…

महाराज श्री : हमारे पदम् पुराण में कहा गया है कि जब कोई संत साधना करता है जैसे मौन साधना कर रहा हो और हम उसमें बाहरी वातावरण में सहयोगी हो गए तो सात फीसदी साधना का पुण्य उसको मिलेगा यह पदम् पुराण में आचार्य रविसेन ने स्पष्ट कहा है। श्रावक को कुछ करने की जरूरत नहीं मेरी, अगर मेरी मौन साधना में आप सहयोगी हो गए तो मेरे पुण्य का सात फीसदी श्रावक को मिलेगा। यही आचार्य रविसेन ने पदम् पुराण में कहा है।

मौन के अलावा श्रावक क्या तपस्या कर सकता जो उसके कर्मों की निर्जरा भी करे और उसे आत्मकल्याण के लिए प्रेरित करे जिसके जरिए समाज का भी कल्याण हो…

महाराज श्री: मनीष जी अगर श्रावक अपना आत्मकल्याण करना चाहता है तो उसके लिए छह आवश्यक कर्तव्य बताए गए हैं: देव पूजा, गुरुपास्थि, स्वाध्याय, संयम, तप और दान। इन छह आवश्यक कर्तव्यों के माध्यम से वह अपने कर्मों की निर्जरा कर सकता है। श्रावक के लिए इसके अलावा कर्मों की निर्जरा के लिए कोई साधन शास्त्रों में नहीं दिया गया है। उसको देव पूजा, गुरुपास्थि, स्वाध्याय, संयम, तप और दान इन छह कर्तव्यों के अलावा कोई भी कर्म निर्जरा का साधन ही नहीं है। अगर वह माइक पर अच्छा बोलता है, समाज में काम करता है, फिर भी अगर भगवान की पूजा नहीं करता है, भगवान की आराधना नहीं करता है, गुरु की आराधना नहीं करता है, संत नगर में आहार नहीं दे रहा है तो उसका पुण्य अर्जन नहीं हो सकता। वह समाज का निर्वाह कर सकता है, समाज की परम्पराओं को निभा सकता है लेकिन वह पुण्य का अर्जन नहीं कर सकता। हां वह भावों का निवर्हन कर सकता है। भाव अच्छे हो सकते हैं, महाराज के पास बैठा है, भाव अच्छे हैं पर कर्म निर्जरा वह नहीं कर सकता, जब तक कि छह आवश्यक कर्तव्य नहीं करेगा। जैसे साधु 28 मूल कर्मों की पालना करता है तो कर्मों की निर्जरा कर सकता है, लेकिन प्रभावना अलग चीज हो गई है। मैं प्रभावना कर लूंगा पर कर्म निर्जरा नहीं कर रहा हूं। श्रावक प्रभावना कर सकता है पर कर्म निर्जरा नहीं कर सकता। इससे उसको गृहस्थ जीवन में जो बाधाएं आती हैं। इतना समाज के लिए काम करता है पर धर्म की बाधाएं आती हैं। इसलिए आती हैं क्योंकि उन्होंने भगवान की आराधना नहीं की, देव पूजा, गुरुपास्थि, स्वाध्याय, संयम, तप और दान छह आवश्यक कत्र्तव्य नहीं किए जो श्रावक का पहला कर्तव्य है। जब बच्चा 45 दिन का होता है तो उसे मंदिर ले जाने की परम्परा है और तब उसे कहा जाता है कि आज से तुम जैन बने हो, तुम्हें अष्टमूल गुणों का पालन करना है। जब वही पालन नहीं हो रहा है तो आप किस प्रकार श्रावक हैं। और आप कैसे उम्मीद करते हो कि कर्म की निर्जरा हो। आप खा तो रहे हो हो कैंसर की दवाई, बीमारी है दल की हो तो कैसे काम चलेगा? या तो दवाई ठीक खाओ या तो डॉक्टर को बदनाम मत करो। ऐसे में श्रावक कहते हैं कि हमने इतना किया हमको कुछ नहीं मिला। तो उन्होंने किया क्या है? हम सीधा दोषारोपण भगवान पर करते हैं, सीधा दोषारोपण महाराज पर लगाते हैं कि हम इतना करते हैं पर हमें कुछ नहीं मिलता है। पर तुम ये बताओ कि तुम्हारा जो कर्तव्य है उसमें तुमने किया कितना? दोषारोपण करना छोड़ें, किसी को दोष देने के बजाय हम अपने अन्दर झांकने का पुरुषार्थ करें कि मैं कितनी गहराई तक पहुंच पाया हूं कि मैं इन 6 आवश्यक कर्तव्यों को मैं कर पाया हूं कि नहीं कर पाया हूं। जो अपने आपको नाप लेगा तो उसकी कर्म निर्जरा उसी दिन से प्रारम्भ हो जाएगी।

आज सर्वत्र अशांति है, हर व्यक्ति बहुत अशांत है, समाज अशांत है, पूरे वातावरण में ही कहीं न कहीं अशांति है। धर्म में शांति की खोज की जाती है, यह शांति अन्दर से किस तरह आ सकती है।

महाराज श्री: देखिए मनीष जी, प्रवचन सुनने से आत्म कल्याण होगा, ऐसा मैंने तो कहीं पढ़ा नहीं है। मैंने तो बस इतना ही पढ़ा है कि जो श्रावक अपने नियमों का पालन करेगा, उसे आत्मशांति मिलेगी। अब धर्म से थोड़ा हटकर व्यावहारिक जीवन की बात करें। अगर आपको घर परिवार में भी शांति चाहिए तो सुबह उठने बाद घर में जितने सदस्य हैं, उनसे एक बार जरूर पूछें कि भाईसाहब मैं बाजार जा रहा हूं आपको कोई काम तो नहीं है, फिर देखो जीवन में शांति ही शांति है। क्योंकि घर वाले आपसे अपेक्षा करते हैं कि आप उनसे पूछो, आप करो या नहीं करो, अलग बात है पर उनकी पूछने की अपेक्षा है कि मेरे से मेरे पिताजी ने पूछा, मेरे से मेरे भाई ने पूछा, घर में शांति चाहिए तो सुबह जब उठ जाओ, अपनी बीवी से कि पूछो कि भई आज बाजार से कुछ लाना तो नहीं है, आज कुछ काम तो नहीं है। मां से पूछो,
बाप से पूछो, भाई से पूछो, बेटे से पूछो। घर में जितने लोग हों, उनसे पूछो तो घर में शांति हो जाएगी कि भैया ने मुझसे तो पूछा और शाम को घर में
आकर कह दो कि हो नहीं पाया मुझसे। कल कर दूंगा, उन्हें ज्यादा खुशी होगी और वह स्वयं आकर कहेंगे कि भाईसाहब कोई बात नहीं, मैं कर लूंगा। क्योंकि व्यक्तियों की अपेक्षा तो थी कि मुझसे पूछा नहीं बस, पूछ लो फिर चाहे उनका कुछ करो न करो, पूछना जरूरी है। अगर शांति चाहिए तो पूछना चाहिए। दूसरों से पूछना सीख लो और स्वयं का कहना बंद कर दो तो जीवन में शांति ही शांति होगी। कहीं जाने की जरूरत नहीं परमात्मा बनने की जरूरत नहीं।

स्वयं का कहना बंद करना वही मौन की हम एक तरह से बात कर रहे थे। आपके कहने का अर्थ है कि अपनी अपेक्षाओं को नियंत्रित कर लें तो आप बहुत हद तक शांति पा सकते हैं।

महाराज श्री: नियंत्रण तो हमको ही करना पड़ेगा, हां अगर दूसरे को नियंत्रित करने जाएंगे तो पूरा मामला ही बिगड़ जाएगा। अशांति का कारण भी यही है कि दूसरे को नियंत्रित करना चाहते हैं। स्वयं पर नियंत्रण करें तो शांति है। वो तो आपको तय करना है कि आप क्या करना चाहते हो। जैन सिद्धान्त ही नहीं, सारे धर्म यही एक बात कहते हैं कि स्वयं पर नियंत्रण करना ही हमारे लिए शांति का सबसे बड़ा कारण है। अगर श्रावक, जो गृहस्थ है, वह अपने पर नियंत्रण करता है तो उसकी गृहस्थी सुखी है। साधु अपने पर नियंत्रण करता है तो संत जीवन सुखी है। अगर दोनों दूसरों को नियंत्रित करने जाएंगे, दोनों दुखी हो जाएंगे।

लेकिन प्रवृत्ति हम इसके उलट देखते हैं। हम देखते हैं, पिता बच्चे पर नियंत्रण करना चाहता है, समाज के दूसरे लोग समाज पर नियंत्रण करना चाहते हैं। हम साधुओं में भी कई बार ऐसी प्रवृत्ति देखते हैं कि समाज को एक दिशा विशेष में ले जाना चाहते हैं। इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए क्या किया जा सकता है?

महाराज श्री : स्वनियंत्रण अपनी जगह हो गया, लेकिन व्यावहारिक जीवन में यह संभव नहीं हो पाता, उसके लिए क्या उपाय हो सकता है कि हम इस नजरिए से चलें तो यह संभव हो सकता है, क्या कोई उपाय हो सकता है जिससे धीरे धीरे कोशिश करें तो यह संभव हो सकता है।

मेरा ऐसा मानना है कि आदमी कोई भी काम करने के पहले जैसे यदि वो समाज के पद पर बैठता है तो समाज के पद पर बैठने पहले कोई सपना न देख ले कि मैं ऐसा करूंगा, मैं वैसा करूंगा। अगर सपना देखा है तो निश्चित ही दुखी हो जाएगा। राजनेता अगर नेतागिरी में जाएगा और सपना देखकर तय करेगा कि मैं ऐसा करूंगा तो दुखी हो जाएगा। संत इस भावना से संत बनें कि मैं जाकर खूब प्रभावना करूंगा, फलाने महाराज जैसे प्रवचन करूंगा तो दुखी हो जाएगा। आप कोई भी काम में जाओ पर सपना लेकर नहीं जाना। जो सहजता से हो गया, उसे स्वीकार करूंगा, वो मैं करूंगा बस। अगर सपना लेकर गए हो कि मैं समाज का अध्यक्ष बना मैं ऐसा कर सकता हूं, मैं ऐसा करूंगा तो संभव नहीं है कि सदैव तुम्हारे चाहे जैसा हो जाए। तो फिर दुखी हो जाओगे। संत भी सोचता है कि मैं संत बनने के बाद ऐसा चाहूं ऐसा कर सकता हूं तो दुखी हो जाएगा। इसी तरह अगर कोई राजनीति में है और वह अपेक्षाओं के साथ जाए तो वह दुखी हो सकता है क्योंकि राजनीति बहुत बड़ा अखाड़ा है। जरूरी नहीं कि सब आपकी बातों को स्वीकार करेंगे। आप तो यह कहें कि मैं अच्छी भावना से जा रहा हूं। और जो जिसके नसीब में होगा, वो होना ही होना है बस में अपना पुरुषार्थ ठीक करते जाऊं। मुझे गलत रास्ते पर नहीं जाना है। इसे उदाहरण के माध्यम से समझते हैं, मनीष जी …जब घोड़े को तांगे में जोता जाता है तो उसकी दोनों आंखों के ओर आड़ लगा देते हैं ताकि वह अपनी दृष्टि से भ्रष्ट न हो और इधर उधर न देखे। क्योंकि इधर-उधर देखेगा तो भागेगा, मारेगा क्योंकि उसको घास से प्यार है। कहीं भी हरा दिखेगा तो भागेगा। तो अब वो जो बांधा है न, इसलिए बांधा है कि उसको घास न दिखे, घास देखेगा तो घोड़ा तुमको छोड़ेेगा। ये घोड़े की प्रवृत्ति होती है। ऐसे ही मनुष्य अपनी प्रवृत्ति को समझ जाए कि मनुष्य भी घोड़े से कम नहीं है। वो ये समझे ले कि जब मैं किसी पद पर बैठ रहा हूं तो घोड़े की तरह आंखों के दोनों किनारों पर आड़ लगा लूं और वही देखूं जो सामने दिखाई दे रहा है। न पहले का देखूं न बाद का और न साइड का देखूं और न ये देखूं कि इसने क्या कहा है और उसने क्या कहा है। जो ठीक है उसका अनुसरण करते जाएं क्योंकि शांति के लिए सबसे अच्छा उपाय यही है कि हम केवल अपना पुरुषार्थ करें क्योंकि लोग अपने दुख से दुखी नहीं हैं बल्कि दूसरों के सुख से दुखी हैं। हमें अपने आप में जाने का पुरुषार्थ करना होगा तभी हम अपनी आत्मा का कल्याण कर सकते हैं। चाहे श्रावक हो या संत।

माता-पिता अपनी महत्वाकांक्षाएं बच्चों पर लाद रहे हैं। महत्वाकांक्षा और अति महत्वाकांक्षा में बहुत बारीक सी लकीर है उसे कैसे समझा जाए?

महाराज श्री: धर्म की परिभाषा और वर्तमान में देखने की भाषा में समझना चाहें तो आज बच्चों को कॉम्पीटीशन में उतारने का जो गलत बीज हम उनमें डालते हैं, यही सबसे बड़ी गलती है हमारी। हमें बच्चों को अपनी प्रतिभा निखारने का उपदेश देना है। जब जब आप बच्चे की तुलना दूसरों से करेंगे, उसमें हीन भावना आएगी और जिसके मन में हीन भावना आती है, उसे आत्महत्या के अलावा दूसरा रास्ता नहीं सूूझता। हमारे जितने भी तीर्थंकर हैं, कहीं ऐसा नहीं लिखा कि उन्होंने बहुत उच्च शिक्षा प्राप्त की है। फिर भी उन्होंने आत्मा का कल्याण किया और हमारे दिलों में राज करते हैं। हम भगवान बाहुबली और भरत की बात करते हैं। भगवान बाहुबली को अहंकार नहीं था लेकिन वे चाहते थे कि जो पिता ने उन्हें दिया है, वह उन्हें प्राप्त हो। भाई को नमस्कार करना हो तो हजार बार नमस्कार है। लेकिन अगर ये बोलते हैं कि चक्रवर्ती को नमस्कार है तो वह मैं नहीं करूंगा क्योकि वह मेरे पिता का दिया अभिमान है। जो अपना है उस पर अभिमान करो, कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन जो दूसरों का है उस पर अभिमान करोगे तो वह अहंकार होगा। ऐसे ही आकांक्षाएं और इच्छाएं हैं। बच्चे का डवलपमेंट यदि हम गलत तरीके से करेंगे तो हमें उसे कहना होगा कि तुम्हारे में कितनी प्रतिभा है, तुम्हारे में कितनी शक्ति है। तुम्हारे अंदर इतना ज्ञान है कि तुम भी अच्छा बन सकते हो, अच्छा कर सकते हो, लेकिन जब हम उसको कॉम्पीटीशन में उतारते हैं तो उसका मन पढ़ाई में नहीं लगता, वह दूसरों को देखता है कि उसके इतने नम्बर आए हैं वह कौनसे सर से पढ़ने गया था, कौनसी कोचिंग में पढ़ने गया था, वह किससे बात कर रहा था। अब हमारी दृष्टि उसकी क्रियाओं पर चली गई। वह जो करता था अगर मैं करूंगा तो इतने नम्बर आएंगे। ऐसे में हमें उसे समझाना होगा कि तुम्हारे में इतनी प्रतिभा है, तुम ऐसा कर सकते हो। हम बच्चों को शुरू से ही गलत बीज दे रहे हैं। आज हम देखते हैं कि बेटियों के साथ गलत व्यवहार हो रहा है। इसका क्या कारण है? क्योंकि जब तुमने उन बच्चों और बेटियों को स्कूल में डाला तो कॉम्पीटीशन में डाला। और भावना बनी कि ऊंची नौकरी करनी है तो उसके हिसाब से ड्रेस पहननी है, उसके हिसाब से काम करना है। जरूरी नहीं कि ऑफिस में काम करने वाले तुम्हारे भाई-बहिन ही हों। कई गलत नजरों से भी आपको देखेंगे। सभी इतने परिपक्व नहीं हो गए संसार में रहकर कि भावनाएं न खराब हों। एक दिन आता है, जब हमारी भावनाएं खराब होती हैं और गलत होता है बच्चियों के साथ। इसमें कहीं न कहीं मां-बाप का दोष है। अगर मां-बाप उनके अन्दर के भावों को जाग्रत करते तो शायद यह अनर्गल क्रियाएं न होतीं। मैं यह नहीं कहता कि इसमें बच्चियों का दोष है। लेकिन जब आपको पता है कि कुएं में पानी बहुत ज्यादा है और आपको तैरना नहीं आता तो तैरने उतरते ही क्यों हो? जब हमारे अन्दर इतनी शक्ति नहीं कि इंद्रियों पर नियंत्रण कर सकें तो हमें उस माहौल में जाना ही नहीं है। हमें किसी पर दोषारोपण करने के बजाय उतना ही समय आत्मचिंतन में लगाना होगा। इससे हमारे भीतर की सारी बुराइयां खत्म हो जाएंगी। जब वातावरण खराब है तो हमें अपने बच्चों का पालन-पोषण भी उसी हिसाब से करना होगा। संस्कार और अनुभव हमें अपने आप में जाने से ही मिल सकते हैं। ऐसे में हमें बस एक ही अभियान चलाने की आवश्यकता है और वह है संस्कृति बचाओ आभियान।

कोई प्रवचन देखने आता है, कोई माला पहनने आता है और कोई माला पहनाने आता है, सुनने वाले 2 फीसदी होते हैं। इससे ज्यादा प्रवृत्ति नहीं है। प्रवचन छूट जाएं, उसका दुख नहीं होता लेकिन वहां गया और माइक पर नाम नहीं आया, इसका दुख होता है। तो अगर आप नाम के लिए गए थे तो पुण्य की बात कहां से आई? तो आप महाराज से, माताजी से और धर्म से, पुण्य की उम्मीद क्यों करते हैं? इसलिए स्वयं को ही सुधरना होगा। जीवन में जो कहना है, वह कह दो और जो करना है, कर दो। जो व्यक्ति दूसरों के दिमाग से चलेगा, वह स्वयं को बरबाद करेगा और जो व्यक्ति स्वयं के चिंतन से चलेगा वह आत्मोत्थान करेगा।

आजकल के युवा ओर बच्चे धर्म की बात करने पर कई तरह के सवाल उठाते हैं। धर्म की तरफ बच्चों को कैसे मोड़ा जाए और उन्हें आत्मकल्याण की राह पर कैसे लाया जाए?

महाराज श्री: जब हम पौधा लगाते हैं तो उसका बड़ा ध्यान रखना पड़ता है। थोड़ा बड़ा होने पर उसके चारों तरफ एक बाड़ लगा देेते हैं। पेड़ जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, हम उसकी सुविधाएं खत्म करते जाते हैं। मेरा मानना है कि जो युवा हैं, उनको धर्म की परिभाषा हम क्या बता रहे हैं, यह हमें देखना होगा। अगर हम उसको क्रिया काण्ड में डालेंगे तो वह जरूर दूर भागेगा। क्योंकि उस युवा की धारणा यह है कि अगर में किसी को खाना खिला दूं तो यह मेरा धर्म है। वो किसी को कपड़े दिलाना, किसी अंधे को सड़क पार करवाना भी धर्म समझता है। तो हमारे बुजुर्गों को भी यह समझना होगा कि यह सब भी धर्म है। पूजा, अभिषेक और भगवान के दर्शन के लिए हम उसे जोर नहीं दे सकते। अगर मिट्टी गीली है और उसका घड़ा बनाना है तो हमें मिट्टी के हिसाब से चलना होगा। पक्का मटका बनने के बाद उसमें कोई परिवर्तन संभव नहीं है। इसीलिए बच्चों को हमेें उनके हिसाब से धर्म समझाना होगा। जब वह परिपक्व हो जाए तो हमें उसको बताना होगा कि अब वो ऐसा करे। घर में बच्चे को लौकिक, व्यावहारिक और आत्मिक धर्म की बात समझानी होगी। बच्चा अगर यूट्यूब के माध्यम से समझना चाहता है तो उसे यूट्यूब के माध्यम से समझाएं। अगर वह फेसबुक या वाट्सअप के माध्यम से समझना चाहता है तो हम उसे उसके माध्यम से समझाएं। अगर समाज इन साधनों का उपयोग कर ले तो धर्म का कल्याण हो जाए। मैं जिस दिन सक्षम हो जाऊंगा तो एक मंदिर तो नहीं बनाऊंगा लेकिन एक ऐसा मीडिया सेंटर बनाऊंगा, जहां हम धर्म की इतनी चीजें वायरल करेंगे कि बच्चा उनको पढ़ पढ़कर पुरुषार्थ कर उनपर अमल की कोशिश करेगा। बच्चे वही चीज चाहते हैं, जिसमें उनको फायदा दिखता है। हम उनको धर्म के बारे में ऐसी क्या चीज बता रहे हैं, जिसमें उनको अपना फायदा नजर आए। जब आप खुद चार घंटे भी पूजा में शांति से नहीं बैठ सकते तो युवाओं से ऐसी उम्मीद कैसे कर सकते हैं। वो जिस माध्यम से समझना चाहे हमें उस माध्यम से समझाना होगा। मंदिर जाना चाहिए, पूजा करनी चाहिए लेकिन वहां जाने के रास्ते को अलग तरह से समझाना चाहिए।

सोशल मीडिया पर धर्म के प्रचार की आपकी योजना क्या है?

महाराज श्री : हम मंदिर इसलिए बनाते हैं कि बच्चा धर्म से जुड़े, बिना मंदिर के आत्मकल्याण नहीं है। बिना गुरु और पूजा के आत्मकल्याण नहीं है, यह तय है। उस आत्मकल्याण तक पहुंचने के लिए हमें कई पड़ाव पार करने होंगे और उसमें सबसे बडा पड़ाव यह है कि मंदिर बनाते समय यह संकल्प करें कि हम हमारे यहां एक व्यक्ति रखेंगे, जो सोशल मीडिया पर हमारे समाज में दिनभर में 10 से 15 मैसेज ऐसे भेजेगा, जो आत्मकल्याण की बात करते हों सिद्धान्त की बात करते हों, आगम की बात करते हों। मैं हर रोज फेसबुक पर एक सवाल पूछता हूं। एक घंटे में 12 हजार लोग उसे देखते हैं और 12 सौ से 15 सौ का उत्तर रोज आता है। मैं यह जानता हूं कि अगर उसने उत्तर देने का भाव किया है तो यह एक तरीके से धर्म की प्रभावना ही है। एक बात हमें और तय करनी होगी कि हमें आत्म प्रभावना करनी है या धर्म प्रभावना और इसके लिए हमें सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना चाहिए। और उनके उपयोग से धर्म की बातें बच्चों को भेजनी चाहिए। सोशल मीडिया से धर्म की प्रभावना बेहतर तरीके से होगी और धर्म बेहतर तरीके से जन-जन तक पहुंचेगा। धर्म के बारे में न जानने वाले लोग ही दूसरे धर्म पर आक्षेप लगाते हैं। आप अपना व्यक्तिगत मैसेज जब इतनी रुचि से भेजते हैं तो संतों का मैसेज भेजने में क्यों पीछे हटते हैं। हम बाकी चीजों में आधुनिकीकरण चाहते हैं लेकिन धर्म को पुराने हिसाब से ही चलाना चाहते हैं, ऐसा क्यों? धर्म की प्रभावना के लिए हमें नए-नए साधनों का उपयोग करना ही होगा। हम धर्म को बदलने की बात नहीं कह रहे, केवल उसकी प्रभावना के लिए साधनों को बदलने की बात कह रहे हैं। संत स्वयं भले इनका उपयोग न करें लेकिन दूसरों को तो प्रेरणा दे ही सकते हैं कि वे धर्म की प्रभावना के लिए इन साधनों का उपयोग करें। तरुण सागरजी ने अपनी चर्या का कोई नुकसान नहीं किया लेकिन सोशल मीडिया से जैन धर्म को इतना प्रचारित कर दिया कि बहुत सारे लोगों के लिए जैन धर्म का मतलब ही तरुण सागरजी महाराज है। यहां मंदिर में हम पूजाघर बनाते हैं, वहां हमें सोशल मीडिया का ऑफिस भी बनाना चाहिए और वहां जो पंडित रहे, उसे कहना चाहिए कि दिनभर में धर्म के 200 वीडियो और 200 पोस्टर वाट्सअप/फेसबुक पर भेजे। आत्मकल्याण में ही हिंसा या अहिंसा देखी जाती है, प्रभावना में नहीं। सोशल मीडिया पर धर्म प्रभावना हो सकती है और उसका कोई गलत इस्तेमाल भी करता है तो इसमें हम क्या कर सकते हैं। हर चीज का दुरुपयोग और सदुपयोग होता है। यही बात सोशल मीडिया के साथ भी लागू होती है। हमने जब आहार का तरीका बदला, प्रवचन देने के लिए माइक का इस्तेमाल शुरू किया तो धर्म प्रभावना में सोशल मीडिया से दूरी क्यों?

श्रवणबेलगोला में हुए महामस्तकाभिषेक में आपका क्या कोई विशेष अनुभव रहा?

महाराज श्री: मैंने श्रवणबेलगाला के स्वामीजी को अपना पिता माना है और वहां की धरती को अपनी मां। मैंने वहां से बहुत कुछ सीखा है। आज जो कुछ मेरे पास है, चाहे साधना की बात हो, चाहे सोशल मीडिया पर प्रचार प्रसार की बात हो, चाहे धर्म प्रभावना की बात हो, चाहे अनुष्ठान करने का तरीका हो, मेरा जीवन शायद श्रवणबेलगोला से ही शुरू होता है। मैं ब्रह्मचारी अवस्था में था, रात को डेढ़ बजे की बात है, स्वामीजी ने मुझसे कहा कि पत्र बनाना है। मैंने कहा कि मुझे नहीं आता। स्वामीजी ने मुझे डांटा कि फिर यहां क्या कर रहे हो? मैं अगले दिन सुबह उठकर बैंगलोर गया, वहां से एक लैपटॉप लिया और चार दिन तक बस सीखता रहा। मैंने सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी वहीं से सीखा। मौन साधना की बात करूं तो 2006 में सवा लाख मंत्रों के जाप मैंने 15 घंटे में किए। स्वामीजी कहते थे जाप हो जाए तो आवाज देना। साधना भी मैंने वहीं से सीखी। और जो व्यावहारिक जीवन में जीता हूं कि कोई आ जाए तो उसे साधन दे देता हूं, गिफ्ट दे देता हूं, वह भी मैंने वहीं से सीखा। आज हजारों आदमियों का सम्मान होता है। आदमी खुश होकर जाता है। धर्म की प्रभावना करता है। वह चीज भी मैंने वहीं से सीखी। मेरा सब कुछ श्रवणबेलगोला है। हिन्दुस्तान के पूरे जैन समाज को श्रवणबेलगोला एवं स्वामी जी से प्रेरणा लेनी चाहिए। मैंने मुनि बनने के बाद श्रवणबेलगाला जाने के बाद स्वामी जी से कहा कि कमेटी में बहुत सारे ऐसे लोग भी हैं, जो काम ही नहीं करते। तो स्वामी जी ने पूछा कि मच्छर काटता है तो डिब्बे में किसे बन्द करते हैं, मैंने कहा मच्छर को, तो स्वामीजी ने कहा कि बस इन्हें पद दे दिया तो इनकी आवाज बंद कर दी। जिन्हें काम करना है उन्हें पद नहीं चाहिए होता है। जो पद में खुश हो जाते हैं, उन्हें उसी में खुश रखो। स्वामीजी ने ही मुझे सिखाया कि किस आदमी का किस तरह से सम्मान होना चाहिए। कैसा व्यवहार करना चाहिए। इतना बड़ा मस्तकाभिषेक हुआ। वहां एक व्यक्ति ने 350 साधुओं को संभाला और 10 लाख आदमियों को संभाला, मेहमानों को संभाला, पत्रकारों को संभाला, समाज की प्रतिभाओं को संभाला, संगीतकारों को संभाला, सबका स्वागत किया। सबका अलग अलग अभिषेक करवाया। उन्होंने अपने प्रति दुर्भावना रखने वाले व्यक्तियों को भी सम्मान दिया, उनकी इसी बात से मैंने अपनी भावना बड़ी करना सीखा।

मैंने जो कुछ सीखा है श्रवणबेलगोला से सीखा है। श्रवणबेलगोला के स्वामीजी से जैन समाज को प्रेरणा लेनी चाहिए कि हमें कैसे कार्यक्रम करना है, कैसे साधुओं की सेवा करनी चाहिए। मंैने वहीं से सीखा है कि अपने जीवन में अपना कर्तव्य पूरा करते रहना है, दूसरों पर ध्यान नहीं देना है क्योंकि जिन्हें जो कहना है, वे तो कहते ही रहेंगे।

भविष्य के लिए आपकी क्या योजनाएं हैं?

महाराज श्री: मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि साधना में जो मैंने पाया है, जाप-अनुष्ठान-पाठ में अपने आपको ढालना चाहता हूूं। मेरा पुुराना जीवन बहुत अलग था। मुनि बनते-बनते मैंने अपने आपको 80 फीसदी समेटा है और बाकी 20 फीसदी इस साधना में समेटा है। और अधिक साधना की ओर बढ़ने का मेरा मानस है। सोशल मीडिया में एक नई क्रान्ति लाने का विचार है। सोशल मीडिया के माध्यम से बच्चों और युवाओं को मंदिर तक रास्ता बता सकते हैं। मैंने इसका प्रभाव बंेेगलुरु में देखा है, जहां ऐसे बच्चे भी हैं जो 4-4 महीने मंदिर नहीं जाते थे, लेकिन सोशल मीडिया की वजह से आज नियमित रूप से मंदिर जाते हैं और दूसरों को भी मंदिर जाने और धर्म की प्र‌भावना के िलए प्रेरित करते हैं। इसलिए मैं कहता हूं कि नई पीढ़ी को साथ लिए बिना धर्म की प्रभावना संभव नहीं है।

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