समवशरण ही वह स्थान है जहां मनुष्य,तिर्यंच,और देव,एक साथ बैठकर सुनते हैं भगवान का धर्म उपदेश – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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मैत्री भाव जगत में मेरा,सब जीवों से नित्य रहे ।

दीन-दुखी जीवों पर मेरे,उर से करुणा स्त्रोत बहे ।

दुर्जन-क्रुर-कुमार्ग रतों पर,क्षोभ नहीं मुझको आवे ।

साम्यभाव रक्खूँ मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे ॥

संसार में समस्त जीवो के प्रति जीव को मैत्री का भाव तीर्थंकर(tirthankar) के समवशरण(samvasharan) में ही होता है । जिनसभा,जिनपुर,जिनावास समवशरण के ही नाम है । समवशरण तीर्थंकर के उपदेश (updesha)देने का स्थान है,समवशरण ही वह स्थान है,जहाँ पर जीव आपस का वैर भाव छोडकर  आत्म कल्याण के निमित्त तीर्थंकर का उपदेश सुनते हैं। समवशरण के प्रभाव से जीव में संसार के प्राणी मात्र के लिए मैत्री का,दु:खी (dukh)जीवों के लिए मन में करुणा और पाप में लगे जीवों पर दया का भाव मन,वचन और काम से आ जाता है,समवशरण की श्रीमण्डप भूमि (bhumi)में प्रवेश करने वाले प्राणी मात्र के मन में समता भाव का उदय संसार के समस्त जीवों के प्रति हो जाता है । समवशरण साक्षात चेतन आत्मा का घर है, जहाँ पर सब जीव एक संस्कारीत परिवार की तरह रहते हैं। इस घर में वही प्रवेश कर सकता है जो देव,गुरु और शास्त्र पर सच्चा श्रद्धान करता हो (सम्यग्दृष्टि ) ।  मनुष्य(manushy),तिर्यंच (tiyanch)और देव(dev) समवशरण की आँठवी श्रीमण्डप भूमि में अपने अपने नियत स्थान पर एक साथ बैठते हैं तथा भगवान(god) का उपदेश(preaching) सुनते हैं। मैत्री,समता का इससे बडा उदाहरण और क्या हो सकता है । जिसके अन्दर देव,शास्त्र और गुरु के प्रति सच्चा श्रद्धान नही होता है वह समवशरण में जाने के बाद भी भगवान का उपदेश नही सुन सकता है ।

धर्म(religion),अर्थ,काम और मोक्ष (moksha) इन चार पुरुषार्थों का  साक्षात फल किसी चेतन आत्मा में देखने को मिलता है तो वह तीर्थंकर नामकर्म प्रकृति के उदय से स्वर्ग (svarg) के सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से कुबेर के द्वारा रत्न-मणियों तथा स्वर्ण आदि से  रचित समवशरण में तीर्थंकर में ही मिलता है । समवशरण की रचना गोल,सामान्य भूमि से बीस हजार हाथ ऊँचा तथा सामन्य भूमि से समवशरण में जाने के लिए बीस(20) हजार सीढीया होती है,जिसे चढकर प्राणी समवशरण में अंतमूर्हत ही पहुँच जाते हैं,यह अतिशय(atishay) तीर्थंकर के शुद्ध भावों  का है,समवशरण में पंचेन्द्रिय जीव ही प्रवेश कर सकते हैं। समवशरण का विस्तार अलग-अलग तीर्थंकर के समय में अलग अलग होता है,तीर्थंकर आदिनाथ(adinath) के समवशरण का विस्तार का विस्तार 12 योजन उसके बाद के तीर्थंकरो का विस्तार क्रमश आधा-आधा योजन कम होते गया इस काल के अंतिम तीर्थंकर महावीर(mahavir) के समवशरण का विस्तार 1 योजन ही रह गया था, विदेह क्षेत्र में सभी तीर्थंकरो के समवशरण का विस्तार हर काल में एक जैसा 12 योजन का ही होता है । समवशरण का विस्तार अवसर्पिणी (avasarpini) काल(kal) में कम होता है तो उत्सर्पिणी (utsarpini) काल में बढता है । श्रद्धा,आस्था के साथ जाने वाले हर प्राणी को स्थान मिलता है,समवशरण में पल्य के असंख्यातवें भाग प्रमाण प्राणी तीर्थंकर की वन्दना में स्थिर रहते हैं,वहा के कोठों के क्षेत्र से यद्यपि जीवों का क्षेत्रफल असंख्यात गुणा होता है ।

तीर्थंकर भगवान के समवशरण में प्रवेश करने वाले प्राणी को तीर्थंकर नामकर्म प्रकृति के उदय से समवशरण में आतंक,रोग,मरण,उत्पत्ति,बैर,कामबाधा,तृष्णा और क्षुधा की पीडाएं नही होती है । प्राणी जैसा अनाज खाता है,जैसे प्राणीयों की संगति करता है तथा जैसे क्षेत्र में जाता है, वैसे ही उसके भाव हो जाते हैं। यही कारण है की समवशरण में ज्ञानावरण,दर्शनावरण,मोहनीय और अंतराय इन चार धातिया कर्मों (karm)को नाश करने वाली आत्मा विराजमान है इसी कारण से समवशरण में प्रवेश करने वाले हर प्राणी के मन में प्राणी मात्र के लिए क्षमा का भाव जाग्रत हो जाता है ।

कहा भी है-

खम्मामि स्क्कजीवाणं सव्वे जीवा खमंतु मे ।

मित्ती मे सव्वजीवाणं वेरं मज्झं ण केण वि ॥

वर्तमान में साक्षात तीर्थंकरो व उनके समवशरण का दर्शन हो  नही सकता पर पुण्य व संस्कार कैसे हो,इसके लिए हमें तीर्थंकरो तथा महापुरुष के चरित्र के साथ उनके संस्कारों को जानने वाले शास्त्र व धर्म से अपने आप को जोडने का काम करना चाहिए,तभी तो हम अपने भावों को निर्मल बना सकते हैं। समवशरण जाकर भगवान का उपदेश सुनने का विचार हर श्वास लेते हुए करना चाहिए । तभी परिवार,समाज तथा राष्ट्र के हर प्राणी की भावनाओं के साथ विचार शुद्ध हो जाएगें । संस्कार का जीवन में पुरा असर रहता है राजा श्रेयांस में पूर्व भव के संस्कारों का स्मरण आया तब वे भगवना वृषभदेव को आहर दान देकर दान तीर्थ प्रवर्तक  बने  ।

समवशरण एक सिनिमा हाल है,जहाँ पर शाश्वत सुख को दिखाने वाले फिल्म शाश्वत सुख का मार्ग फिल्म दिन में चार बार फिल्म चलती है,फिल्म संसार के प्राणी मात्र को संसार से मोक्ष जाने का मार्ग बताती है । तीर्थंकर ही शाश्वत सुख का मार्ग फिल्म के डारेक्टर,निदेर्शक,प्रोडिसर तथा हिरो आदि है । फिल्म को देखने का टिकिट सम्यग्दर्शन आदि है,जिसके पास यह टीकिट है वह फिल्म देख कर मोक्ष मार्ग पर लग जाता है तथा संसार में रहकर भी दु:ख मे सुख का अनुभव करने लग जाता है। आने वाले दु:ख को अपने कर्म का उदय मानता है,उस दुख को शांत भाव से सहन करता है ।

समवशरण वह पाठशाला है जहाँ पर बिना भेद भाव के साथ प्राणी मात्र के लिए एक जैसा उपदेश आत्म को परमात्मा बनाने का मिलता है । समवशरण वह पाठशाला है जहाँ पर हमारा ज्ञान प्रति समय  निर्मल होता जाता है ,एक दिन वही ज्ञान केवलज्ञान हो जाता है । भगवान महावीर के समवशरण में जब मिथ्यादृष्टि इन्द्र्भूति ब्राह्मण पहुँचा तो वह समवशरण में पहुंचते ही सम्यग्दृष्टि हो गया भगवन महावीर का गणधर बना । उसके बाद संसार के प्राणी को दु:ख से निकल कर मोक्ष का रास्ता दीखाने के  लिए समवशरण में तीर्थंकर की दिव्य ध्वनि खिलना प्रारंभ हुए,ऐसा नियम है की समवशरण में तीर्थंकर की दिव्य ध्वनि गधरण के बिना नही खिरती है । समवशरण में तीर्थंकर की दिव्य ध्वनि 700 लघु भाषा,18 महाभाषा में दिन में चार बार 2 घण्डे  45 मिनिट खिरती है । समवशरण में तीर्थंकर की दिव्य ध्वनि सर्वांग से खिरती है । समवशरण में दिव्य ध्वनि को फैलाने का काम माघध जाति के देव करते हैं। तीर्थंकर की दिव्य ध्वनि सुनने का अधिकारी सम्यग्दृष्टि ही होता है । तीर्थंकर महावीर को प्रात: मोक्ष हुआ तो उसी दिन शाम को गणधर को केवलज्ञान हो गया,यह अतिशय है समवशरण का की मिथ्याय ज्ञान से सम्यग्ज्ञान और सम्यग्ज्ञान से केवलज्ञान बन गया । तीर्थंकर महावीर व गौतम गणधर के निमित्त ही दीपावली पर्व मनाते हैं।

समवशरण की रचना हम 31 भागो के आधार पर समझ सकते हैं अर्थात समवशरण की रचना 31 अधिकारों में हुई है । 1.सामान्य भूमि 2.सोपान 3.विन्यास 4.वीथी 5.धूलिसाल(प्रथम कोट) 6.चैत्य प्रसाद भूमि 7.नृत्यशाला 8.मानस्तम्भ 9.वेदी 10.खातिका भूमि 11.वेदी 12.लता भूमि 13. साल(द्वितीय कोट) 14.उपवन भूमि 15.नृत्यशाला 16.वेदी 17.ध्वज भूमि 18.साल (तृतीय कोट) 19.कल्प भूमि 20.नृत्यशाला 21.वेदी 22.भवन भूमि 23.स्पूत 24.साल(चतुर्थ कोट) 25.श्री मण्डप भूमि 26. बाहर सभा (ऋषि आदि गण ) 27.वेदी 28.पीठ 29.द्वीतीय पीठ 30.तृतीय पीठ 31.गन्धकुटी

समवशरण में 20 हजार सीढीयां चढने के बाद धूमिशाल नाम का प्रथम कोट होता है जिसके चारों दिशाओं में एक-एक महाद्वार होता है,पूर्व आदि दिशा से क्रमश विजय,वैज्यंत,जयंत और अपराजित नाम के महाद्वार होते हैं,इन महाद्वारों की ऊँचाई तीर्थंकर की ऊँचाई से 12 गुणा होती है । महाद्वारा मंगल द्र्व्य,नवनिधियों तथा धूप के घटों आदि वस्तुओं से युक्त होते हैं। प्रत्येक द्वार के  दोनों और एक-एक नाट्यशाला होती है । महाद्वार की रक्षा ज्योतिषि देवों करते हैं । धूलिशाल कोट के अन्दर चैत्य प्रसाद भूमि है ।

पहली चैत्य प्रसाद(chaity prsad bhumi) भूमि

यह भूमि धूलिशाल परकोटे के अन्दर होती हैं,इस भूमि में पाँच-पाँच देव प्रसाद के अंतराल से एक-एक भगवान जिनेन्द्र का चैत्यालय होता है,इस चैत्यालय की ऊँचाई भगवान जिनेन्द्र की ऊँचाई से  बारह गुनी होती । इस भूमि के चारों तोरण द्वारों के सामने होती हुई चारों दिशाओं से चार गलियां सीधी श्रीमण्डप भूमि की प्रथम कटनी तक जाती है । इस भूमि की गलियों के दोनों पार्श्व भागों में दो-दो नाट्य शालायें रहती हैं । प्रत्येक नाट्य शाला में 32-32 रंगभूमिया होती है । प्रत्येक रंगभूमि में 32-32 भवनवासी  देवांगनाएँ नृत्य करती रहती है । इसी भूमि के चारों वीथियों के मध्यभाग में एक-एक मानस्तम्भ चारों दिशाओं में है । इसी भूमि में चारों दिशाओं में एक एक मास्तम्भ होता है।

मानस्तम्भ समवशरण जिस तीर्थंकर का होता है उनकी ऊँचाई से मानस्तम्भ 12 गुना होता है । मानस्तम्भ के दर्शन से मिथ्यात्व का नाश हो जाता है,मान स्तंभित हो जाता है और सम्यक्त की प्राप्ति होती है । इसी कारण से इसे मानस्तम्भ कहते हैं । समवशरण में मानस्तम्भ के दर्शन से इन्द्रभूति ब्राह्मण का मान भंग हो गया उसने भगवान महावीर का गणधर बन कर मोक्ष को प्राप्त किया । मानस्तम्भ में चारों दिशाओं में एक-एक प्रतिमा होती है । मानस्तम्भ के पार्श्व भाग में एक बावडी होती है जिसका पानी बहता हुआ कुण्ड में जाता है वहा पर समवशरण में आने वाला प्राणी अपने पैर को पानी से साफ करता है । इसके बाद दूसरी खातिका भूमि आती है ।

दूसरी खातिका (khatika bhumi)भूमि

खातिका भूमि में जल से भरी तीर्थंकर की ऊँचाई से एक चौथाई गहरी खाई होती है,इसीलिए इस भूमि को खातिका भूमि कहते हैं। इस भूमि के बाद दूसरी वेदी होती है । उसके बाद तीसरी लता भूमि आती है ।

तीसरी लता(lata bhumi) भूमि

लता भूमि में अनके कीडा पर्वत व वापिकाओं से सहित है,जो अत्यंत सुंदर तथा अनेक बेल लताओं से परिपूर्ण है । इससे आगे द्वीतीय कोट है जो यक्ष देवों के द्वार रक्षित है । इसके बाद चौथी उपवन भूमि है

चौथी उपवन(upavan bhumi) भूमि

उपवन भूमि में अनेक प्रकार के वन,वापिकाएँ व चैत्य वृक्ष है । चारों वीथियों के पार्श्व भाग में 2-2 नाट्यशालाएँ है,कुल 16 नाटशालाएँ जिसमें 8 भवनवासी और 8 कल्पवासी देवियाँ नृत्य करती रहती है । पूर्वादि चारों दिशाओं में क्रम से अशोक,सप्तच्छन्द,चंपक और आम्र वन होते है,इसीलिए कारण इस भूमि को उपवन भूमि कहते हैं। उपवन भूमि में बावडियाँ होती है जिसमें प्राणी अपना चहेरा देखे तो उसे अपने स्वयं का सात भव दिखाई देता है । उपवन भूमि के बाद तीसरी वेदी है जिसकी रक्षा यक्ष देव करते हैं। इस वेदी वर्णन प्रथम धूलिशाल कोट के समान है । इसके बाद पाँचवी ध्वज भूमि होती है ।

पांचवी ध्वज(dhvaj bhumi) भूमि

ध्वज भूमि में सिहं,गज,वृषभ,गरुड,मयुर,चन्द्र,सूर्य,हंस,कमल और चक्र के चिन्ह से युक्त अलग-अलग दस प्रकार की 108-108 ध्वजाएँ चारों दिशाओं  होती है । प्रत्येक महाध्वजा को घेरकर 108 ध्वजाएँ होती है,इसप्रकार कुल 4,70,880 ध्वजाएँ होती है । इसी भूमि के आगे तीसरा कोट है इसका वर्णन धूलिशाल कोट के समान है । इसके बाद छठी कल्पभूमि होती है।

छठी कल्पभूमि (kalpbhumi)

कल्पभूमिमें पानांग,मालानांग,बस्तांग,भोजनांग,आलयांग,आभूषणांक,तूर्यांग,दीपांग,भाजनांग,रसांग जाति के दस कल्पवृक्ष होते हैं। जैसे कल्पवृक्षों के नाम है उसी प्रकार की साम्रगी उस वृक्ष के इच्छा करने से वह साम्रगी मिल जाती है । इस भूमि में अनेक वापिकाएँ,प्रसादों (भवन)और चारों दिशाओं में पूर्वदिशा से क्रमश: नमेरु,मन्दार,संतानक और पारिजात नाम के चार सिद्धार्थ वृक्ष(चैत्य वृक्ष) होते हैं,प्रत्येक वृक्ष की चारो दिशाओं में (एक-एक?) सिद्ध प्रतिमाएँ होती है,जिनकी सब वन्दना,भक्ति आदि करते हैं। कल्प भूमि के दोनों पार्श्व भागों में प्रत्येक वीथियो के आश्रित चार-चार नाटशालाएँ कुल 16 नाट्शालाएँ है,जिसमें ज्योतिष जाति की कन्याएँ नृत्य करती रहती है । इसके आगे चौथी वेदी है,जो भवनवासी देवों द्वारा रक्षित है । इसके बाद सातवी भवन भूमि होती है ।

सातवीं भवन भूमि(bhavan bhumi)

भवन भूमि में ध्वजा-पताका सहित अनेक भवन होते हैं। भवन भूमि के पार्श्व भाग में वीथियों के मध्य में जिन प्रतिमाओं से युक्त नौ-नौ स्पूत (72 स्पूत) होते हैं। भवन भूमि के आगे  चौथा कोट होता है जो कल्पवासी देवोँ के द्वारा रक्षित होता हैं। इसके बाद आठवी श्रीमण्डप भूमि होती है ।

आठवीं श्रीमण्डप भूमि (shrimandap bhumi)

श्रीमण्डल भूमि में सम्यग्दृष्टि जीव ही प्रवेश कर सकता है । इस भूमि में 12 सभाएँ होती होती है जिसमें क्रमश: मुनिराज,कल्पवासी देवियाँ,आर्यिकाएँ,श्राविकाएँ,ज्योतिषी देवियाँ,व्यंतर देवियाँ,भवनवासी देवियाँ,भवनवासी देव,व्यंतर देव,ज्योतिषी देव,कल्पवासी देव,मनुष्य तथा तिर्यंचो की सभा होती हैं। इसी भूमि में तीन कटनी होती है । प्रथम कटनी वैडूर्यमणि की बनी होती है,इस कटनी पर चढने के लिए चारों दिशाओं में सोलह-सोलह सीढियाँ होती है,इस कटनी पर यक्षेन्द्र देव धर्म चक्र लेकर खडे होते हैं । श्रीमण्डप भूमि में आने वाले सभी प्राणी इसी की तीन प्रदिक्षणा लगाकर अपने नियत स्थान पर बैठ जाते हैं। दुसरी कटनी पर जाने के लिए पहली कटनी से आठ-आठ सीढियाँ चारों दिशाओं में होती हैं दुसरी कटनी पर सिंह,बैल,कमल,चक्र,माला,गरुड,हाथी आदि चिन्ह वाली ध्वजाएँ होती है तथा नौ निधियाँ,अष्ट मंगल द्रव्य एवं पूजन द्रव्य दूसरी कटनी पर होते हैं। दुसरी कटनी पर से तीसरी कटनी पर जाने के लिए चारोओं आठ-आठ सीढियाँ होती है,यह सुर्य के समान तेज गोलाकार होती है । इस कटनी का विस्तार छ: सौ धनुष  ऊँचा तथा नौ सौ धनुष चौडा होता है । छत्र,चंवर,सिंहासन आदि अष्टप्रातिहार्य और कल से सहित गंध कुटी होती है । तीर्थंकर भगवान सिंहासन से चार अंगुल ऊपर विराजमान होते हैं। समवशरण में तीर्थंकर का मुख पूर्व दिशा की और ही होता है,जो चारों दिशा में दिखाई देता है,वह तीर्थंकर प्रकृति के अतिशय के कारण दिखाई देता है । श्रीमण्डप भूमि में वही जीव प्रवेश कर सकते हैं, जिन्हें देव,गुरु व शास्त्र में दृढ विश्वास के साथ धर्म और उसके फल में संशय नही हो अर्थात वह सम्यक्दर्शन के साथ हो।

तीर्थंकर के समवशरण की रचना उनके पुण्य कर्म के उदय के साथ तीर्थंकर प्रकृतिनाम कर्म के उदय से होती है । समवशरण तो तीर्थंकरों का घर ही है जहाँ पर प्राणी का स्वागत होता है तीर्थंकरों के समवशरण से हमे त्याग,संयम,क्षमा,चारित्र और सोलहकारण भावनाओं की आराधना करने की प्रेरणा मिलती है।

समवशरण संसार का वह पवित्र स्थान है जहाँ पर अशुभ कर्म के उदय से अपवित्र आत्मा भी पवित्र बनने की प्रेरणा लेता है । जहाँ पर शत्रु भी मित्र बन कर स्व-पर कल्याण की भावना भाता है । वात्सल्य,प्रेम की नदी प्राणी मात्र के मन में बहने लगती है । परिवार,समाज,राष्ट्र में एकता का शंखनाद यही से हो सकता है,सिंह जैसा क्रुर प्राणी वात्सल्य का प्रतिक गाय के साथ पानी  समवशरण में ही पीता है । एकता का पाठ समवशरण से लेना चाहिए की किस प्रकार से अलग-अलग गति और जातियों  प्राणी एक साथ रहते हैं। समवशरण पाठशाला में  कर्म और उसके फल का पता चलता है । समवशरण से हमे धर्म और धार्मात्मा का महत्व का पता  चलता है और परमात्मा बनने की भावना जाग्रत होती है । दर्पण में हम अपना मुख देखकर उसे ठीक कर लेते हैं उसी प्रकार तीर्थंकर और उसके वैभव को देखकर हमारी आत्मा मे विधय मान परमात्मा बने की शक्ति को उर्जा मिलती है । अहिंसा का सब से बडा साक्षात दर्शन भी यही देखने को मिलता है । तीर्थंकर ही पूर्ण अहिंसा की प्रतिमा है ।

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