संस्कारों का शंखनाद करने वाला पर्वः दशलक्षण पर्व – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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मुनि चर्या के ज्ञान को साकार करते हैं श्रावक
पर्व का सम्बंध व्यक्ति विशेष से नही, आत्मा के गुणों से : संस्कारों की प्रारम्भिक और प्रायोगिक पाठशाला

जैन समाज का पर्युषण या दशलक्षण पर्व हर मुनि बनने वाले की प्रारम्भिक पाठशाला तो है ही, मुनि धर्म के संस्कार डालने की भी प्रायोगिक पाठशाला है। प्राचीनकाल में इसी समय राजा अपने बच्चों को स्वावलंबन, शिक्षा और अध्ययन के लिए जंगलों में गुरु के पास भेजते थे। ठीक वैसा ही वातावरण और आचार-व्यवहार पयुर्षण पर्व पर भी होता है, जब मुनि धर्म की चर्या का ज्ञान लोगों के समक्ष साकार हो उठता है। इस संस्कार पाठशाला में जैन समाज के 8 साल के बालक से लेकर 90 वर्ष आयु तक के श्रावक अध्ययन के लिए आते हैं। कोई इस पाठशाला से ज्ञान लेकर मुनि बनता है तो कोई जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन करने का व्रत लेता है तो कोई श्रावक बनकर जीवनयापन का संकल्प करता है। आत्मशुद्धि के लिए इच्छाओं का रोकना तप है। मानसिक इच्छाएं सांसारिक बाहरी पदार्थों में चक्कर लगाया करती हैं अथवा शरीर के सुख साधनों में केन्द्रित रहती हैं। शरीर को प्रमादी न बनने देने के लिए बहिरंग तप और मन की वृत्ति को आत्म-मुख करने के लिए अन्तरंग तपों का विधान है। दोनों प्रकार के तप आत्मशुद्धि के अमोध साधन हैं।

मन को नियंत्रण करने का संस्कार

पयुर्षण पर्व संस्कारों के शंखनाद का आगाज करने वाला पर्व है। इस काल के दौरान जैन समाज के लोग पांच, दस, तीन अथवा एक उपवास कर अपने जीवन में मुनि धर्म संस्कार लाने का पुरुषार्थ करते हैं। वे गर्म पानी पीते हैं, चटाई पर सोते हैं और कई तो दस दिन तक व्यापार का भी त्याग कर देते हैं। वे आधुनिक संसाधनों जैसे मोबाइल आदि का उपयोग भी छोड़ देते हैं, ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। दिन में तीन सामयिक, दो बार प्रतिक्रम करते हैं। जो उपवास नहीं करता, वह भी दिन में एक बार ही खाद्य पदार्थ ग्रहण करता है। दिन भर में लगे पापों का प्रायश्चित मुनि, संयमी शाम को करता है और रात में लगे दोषों का प्रायश्चित सुबह कर लेता है। जीव की रक्षा के भाव से श्रावक हाथ में कपड़ा रखता है तो साथ में परिग्रह का परिमाण भी करता है। जैन धर्म के सभी त्योहार में यही एकमात्र पर्व है, जहां तन को संवारने, धन को त्यागने, मन को नियंत्रण करने का संस्कार पाठशाला के माध्यम से दिया जाता है। यह कह सकते हैं कि ये दिगम्बर जैन समाज में कपड़े वाले मुनि हैं। श्रावक दस दिन तक बालों की कटिंग भी नहीं करवाते हैं तो 8 साल के बालक से लेकर 60 साल तक के वृद्धजन अभिषेक पूजन सीखते और करते हैं। 80 वर्ष की वृद्धा नृत्य करने लग जाती है तो 8 साल का बच्चा अभिषेक का कलश पकड़ अभिषेक करता है। रंगीन कपड़े त्याग सफेद, पीले धोती उप्टा पहना जाता है।

दशलक्षण पर्व पर शिविर भी

मुनि सुधासागर, आर्यिका पूर्ण मति माता, मुनि प्रमुख सागर, मुनि प्रणाम सागर 10 दिन का शिविर भी दशलक्षण पर्व पर करते हैं।

प्रथम प्रकरण

1998 से पहले मैं स्वयं पर्युषण पर्व में मन्दिर जाता था, अभिषेक करता था तो आज मुनि बनकर धर्म प्रभावना और आत्मकल्याण कर रहा हूं। वर्ष 1998 के पहले पढ़ाई के साथ पत्रकारिता करता था, पर पर्युषण पर्व के संस्कार ने मुझे मुनि पथ पर आरूढ़ कर दिया।

द्वितीय प्रकरण

कर्नाटक स्थित श्रवणबेलगोला के चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी आज जैन मन्दिरों की रक्षा भट्टारक बनकर कर रहे हैं। वह भी गुरुकुल में पढ़ते थे और मुनि की सेवा करते थे। वे भी आज संत बन गए हैं।

पर्यावरण संरक्षण का पर्व

दशलक्षण पर्व प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ा हुआ है। इसे धर्म से इसलिए जोड़ा गया है क्योंकि जो भी सकारात्मक कार्य होता है, वह आखिर में धर्म ही तो है। पर्यावरण असंतुलन पूरी दुनिया में आज सबसे ज्यादा चिन्ता का विषय है। हमें मालुम है कि प्रकृति और पर्यावरण का संतुलन तब बिगड़ता है, जब इंसान में क्रोध, अहंकार, माया, लोभ, असत्य, असंयम, स्वच्छन्दता, परिग्रह, इच्छा, वासना आदि के भाव पैदा होते हैं। इन्हीं बुरे भावों पर नियंत्रण करने के लिए दस धर्म पालन रूपी ब्रेक लगा दिया गया है। इसके पीछे भावना यही है कि प्रकृति और पर्यावरण का संतुलन बना रहे और साथ ही हम धर्म का पालन करने के साथ ध्यान भी करते रहें।

ऐसे हुआ दशलक्षण का प्रारम्भ

आदिकाल से पृथ्वी या यूं कहें कि समूचे ब्रह्मांड में धीरे-धीरे परिवर्तन होता रहता है। एक समय ऐसा भी आता है कि पृथ्वी पूरी तरह नष्ट हो जाती है और वापस धीरे- धीरे बनने लगती है। धर्म के अनुसार यह सब अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल के परिवर्तन के कारण होता है। सुख, आयु आदि जिसमें कम होती है उसे अवसर्पिणी काल और जिसमें आयु, सुख बढ़ता है उसे उत्सर्पिणी काल कहते हैं। इन दोनों के बीच के संक्रमण काल में 96 दिन होते हैं। यह सृष्टि के नाश और रचना का मुख्य काल होता है। सात-सात दिन तक सात प्रकार की वर्षा होती है जिनमें जहर, ठंडे पानी, धूम, धूल, पत्थर, अग्नि आदि की वर्षा शामिल हैं। इनसे पूरी पृथ्वी नष्ट हो जाती है। उसके बाद रचना को फिर से बनाने के लिए सात-सात दिन तक शीतल जल, अमृत, घी, दिव्य रस, दूध आदि की वर्षा होती है। इससे पृथ्वी हरी-भरी हो जाती है और चहुं ओर खुशी की लहर दौड़ पड़ती है। इसके अंतिम 49 दिन तक जो सुवृष्टि होती है, उसका प्रारम्भ श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी से होता है और वह भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तक होती है। उसके बाद जो 72 जोडे़ मनुष्य और तिर्यंचों के, देवों और विद्याधरों ने विजयार्थ पर्वत की गुफा में छिपाए थे, उन्हें निकाला जाता है। यही जोड़े भाद्रपद शुक्ल पंचमी से 10 दिवसीय उत्सव मनाते हैं। उसे ही आज दशलक्षण पर्व के रूप में मनाया जाता है।

मानव के भीतर मानवता का भाव

संस्कार से व्यक्ति महान और संयमी बन जाता है। आचार्य जिनसेन, जिन्होंने जन्म से कपड़े नहीं  पहने, उन्हें उनके आचार्य अपने साथ ले गए और 8 वर्ष में दीक्षा दे दी। बाद में वे मुनि बनकर और साधना के बल पर आचार्य जिनसेन बन गए।  कहा जाता है कि उनकी मां बचपन में उन्हें  दूध पिलाते समय कहती थी कि तुम्हें मुनि बनना है, साधना कर आत्मकल्याण करना है। दशलक्षण भी यही है जो मानव के अंदर मानवता पैदा करता है ।

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