ग्यारहवां दिन : संत और प्रभु जगत के होते है और जगत उनका – अन्तर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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मुनि पूज्य सागर की डायरी से

आज मेरी मौन साधना का 11 वां दिन । आत्म साधना जाति-धर्म से हटकर होती है। आत्मा का कोई धर्म नहीं होता है। जाति, धर्म और समाज यह सब केवल सामाजिक व्यवस्थाएं है। देश और समाज को एक सूत्र में बांधने, मिलजुल कर रहने की व्यवस्था है। जो सांसारिक मार्ग पर चल रहे है उन्हें इन व्यवस्थाओं का पालन करना चाहिए। लेकिन जिसने आत्मकल्याण के मार्ग पर चलना शुरू कर दिया, उसे कोई धर्म या जाति के बंधन में नहीं रहना चाहिए। व्यक्ति साधना के मार्ग पर चलने के लिए किसी भी संत और प्रभु का अवलम्बन प्राप्त कर सकता है। इसी कारण प्रभु और संतो के नाम के साथ कोई गौत्र, जाति या सरनेम नहीं होता है। संत और प्रभु जगत के होते है और जगत उनका। संत और प्रभु भेदभाव, राग, द्वेष, हिंसा और परिग्रह से रहित होते है। इनका जाति और धर्म से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता है। उनका एक ही धर्म और जाति होती है और वह है सकारात्मक सोच, शुद्ध आचरण और हितकारी वाणी। संत और प्रभु तो जाति और धर्म का भेद मिटाने का आइना होते है। व्यक्ति की पवित्रता उसकी जाति या धर्म से नहीं, उसकी सोच, विचार और कार्य से होती है। साधना से इन्हीं सभी को व्यवस्थित किया जाता है। मौन साधना से मेरी सोच, उपदेश और कार्य में परिवर्तन आया। इसमे कोई संधे भी नहीं है और इसे स्वीकारने में कोई शर्म भी नहीं है। जिस समय से साधना के मार्ग से जाति और धर्म का भेद व्यक्ति के भीतर से निकल जाएगा और सामाजिक व्यवस्थाओं में जाति और धर्म के प्रति दृढ़ता आएगी, उसी समय से यह धरती और स्वयं का घर स्वर्ग समान बन जाएंगें। स्वयं का मन मंदिर और पवित्र विचार प्रभु बन जाएंगे। पवित्र विचारों के पुंज का नाम ही प्रभु है। हर दिल मंदिर और विचारों का पूंज प्रभु का रूप ले लेगा।

रविवार, 15 अगस्त, 2021 भीलूड़ा

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