“संतजन वंदनीय क्यों माने जाते हैं?’- अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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सूर्यकुल में भगवान राम के दादा अज बड़े दानी थे। वह प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में उठकर भगवान की भक्ति किया करते थे। वे भक्ति में इतने मग्न हो जाते थे की संसार की ओर ध्यान ही नहीं देते थे। भगवान की भक्ति के बाद वे याचकों को दान दिया करते थे। जिस याचक को जो चाहिए उसकी कामना अनुरूप वे उसे वही दिया करते थे। उनके यहाँ से कभी कोई भी खाली हाथ नहीं जाता था। एक दिन राजा अज अपने दैनिक कार्य कर, घोड़ों के अस्तबल में चले गए। वहाँ जाते ही उनके पीछे ही एक साधु आ गए। साधु को कुछ चाहिए नहीं था, पर उन्हें राजा के अभिमान को दूर करना था, जो उन्हें प्रतिदिन दान देने से आ गया था। राजा ने महात्मा को प्रणाम किया और आने का कारण पूछा। साधु ने कहा, «मुझे लंगोटी चाहिए जो फट गई है।’ राजा ने कहा, «दान देने का समय निकल चुका है। अतः आप कल आए, आपको जो चाहिए मिल जाएगा।’ साधु ने कहा,» मेरा आश्रम तो बहुत दूर है। आज चला भी गया और कल सुबह वहाँ से वापस निकलता हूँ तो भी आप के दान देने के समय तक नहीं पहुँच पाऊँगा।’ राजा ने कहा, «आज तो नहीं दे सकता।’ साधु अपने स्थान पर अडिग रहे कहने लगे,› दान तो लेकर ही जाऊँगा›। दोनों में धर्म को लेकर एक तरह की बहस सी छिड़ गई। राजा ने कहा,» मेरे पास तो अभी देने को कुछ नहीं है।’
एक कहावत है : अहंकारी को ज्ञान देना जले पर नमक लगाने जैसा है। «अति संघर्ष करे जो कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई।।’ अर्थात् अधिक रगड़ने से शीतल स्वभाव वाले चंदन से भी अग्नि की ज्वाला प्रकट हो जाती है।
कुछ ऐसा ही असर साधु के उपदेश का राजा पर हुआ। राजा अज को क्रोध आ गया और उन्होंने क्रोध में आकर साधु की झोली में घोड़ों की लीद डाल दी। साधु ने स्वीकार करते हुए कहा की,»राजा आप का दिया दान करोडों गुना फले, ताकि आप इसी वस्तु का ही भोग करते रहें।’ यह कहकर महात्मा अपनी कुटीर की ओर चले गए। उन्होंने राजा के द्वारा दान में मिली लीद को एक बड़े मैदान में डाल दिया। राजा अज की दी लीद दिनों दिन बढ़ने लगी कुछ ही दिनों में वहाँ लीद का ढेर लग गया। एक दिन राज अज जंगल की ओर घूमने निकले और घूमते-घूमते उन्हीं साधु के आश्रम के निकट जा पहुँचे। वहाँ पर घोड़े की इतनी सारी लीद देखकर राजा ने मंत्री से कहा जब यहाँ इतनी लीद है !! तो सोचो कितने घोड़े होंगे ? राजा के कहने पर मंत्री आश्रम में गया वहाँ जाकर साधु को प्रणाम कर पूछा की ,»यहाँ पर तो एक भी घोड़ा नहीं दिखाई दे रहा, फिर इतनी सारी लीद कहाँ से आई ???’ तब साधु ने कहा की, «एक दिन मैं राजा से लंगोट लेने गया था, तब राजा ने लंगोट न देकर घोड़े की लीद दे थी। वह मैंने यहाँ डाल दी। तभी से यह बढ़ती जा रही है। क्योकिं दान का फल बट बीज के समान बढ़ता रहता है। एक दिन राजा को अपने दान का फल भोगने के लिए सुअर की योनि में जन्म लेना होगा क्योंकि घोड़े की लीद सुअर ही आसानी से खा सकता है।’ साधु की बात सुनकर मंत्री के होश उड़ गए। उसने राजा को जाकर सारी बात दी। यह सुनते ही राजा के होश उड़ गए। राजा अज सीधे साधु की शरण में गये। और कहा, हे महात्मन् , «मैं अपने द्वारा किए कृत्य के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ एवं इस पाप से छुटकारा चाहता हूँ।’ महात्मा ने कहा,»यह तो तुम्हारा दिया दान है राजन, इसका फल दूसरा कौन भोग सकता है? पर हाँ एक उपाय है, जिसके करने पर तुम इसे खाने से बच सकते हो। वह उपाय यह है की जो जनता तुम्हें धर्मात्मा मानती है, अगर वही जनता तुम्हारी निंदा करे, तो तुम्हारे हिस्से की लीद उनमें थोड़ी- थोड़ी बँट जाएगी और तुम सुअर की योनि में जाने से बच जाओगे। पर समस्या यह थी की राजा बड़ा दानी और धर्मात्मा था कोई चाहकर भी राजा अज की निंदा नहीं कर सकता था। राजा सोचने लगा कि ऐसा क्या करूँ, की लोग मेरी निंदा करें?? राजा ने एक बोतल में गंगाजल लिया और उसमे रंग मिला दिया जिससे लगे की वह शराब है, और एक वैश्या को बुलाकर उसके गले में हाथ डाल कर घुमने लगा। लोग यह देखकर राजा की निंदा करने लगे। चहुँओर यह बात फैल गई के अब इस राजा से न्याय की उम्मीद रखना बेकार है। जैसे-जैसे राजा की निंदा होने लगी घोड़े की लीद कम होने लगी। एक दिन राजा आश्रम में साधु के पास गये तो देखा लीद कम तो हुई किंतु समाप्त नहीं हुई है। राजा ने साधु को प्रणाम कर पूछा,”मेरी इतने लोगों ने निंदा की, उसके पश्चात् भी इतनी लीद बाकी कैसे रह गई ?’ तब साधु कहा,»यह तुम्हारा दिया दान है राजन, इसका थोड़ा फल तुम्हें ही भोगना होगा। किंतु तुम चाहते हो की यह भी खत्म हो जाए, तो कोई महात्मा अथवा ब्रह्मज्ञानी पुरुष तुम्हारी निंदा करें तभी यह लीद खत्म हो सकती है।’


राजा एक साधारण व्यक्ति का रूप धारण कर गुरु वशिष्ट के पास गए। वहाँ उनके पैर दबाते हुए, राजा स्वयं अपनी निंदा करने लगे ताकि गुरु वशिष्ट भी निंदा करने लगें। तभी गुरु वशिष्ट ने कहा, «तुम राजा हो मैं तुम्हारी निंदा नहीं करने वाला हूं, क्योंकि मैं तुम्हारे भेद को जानता हूं। तुम व्यर्थ में ही हमें लीद खिलाने की कोशिश कर रहे हो।’ गुरु वशिष्ट ने कहा की,»तुमने हमारी सेवा की है, तो मैं तुम्हें लीद खाने का एक आसान तरीका बता देता हूँ। तुम उन संत के पास जाओ और दीन भाव के साथ वह बची हुई लीद माँग लो। उसे सुखाकर तथा कूट कर रख लो और रोज एक-एक फाँकी लिया करो। तुम्हें इस दण्ड से मुक्ति उसे खाने से ही मिलेगी। तुम्हें एक संत के निरादर का यह दंड मिला है। आगे से कभी अभिमान न करना, सदा संतों के चरणों की वंदना करते रहना। उनके आशीर्वाद से ही तुम्हारा कल्याण होगा। संतों के समक्ष अभिमान करोगे तो यही गति होगी, जैसी होने जा रही थी।’ राजा अज ने गुरु वशिष्ट की आज्ञा का पालन कर स्वयं उस लीद को खाना आरंभ किया ।
इसलिए कभी भी त्याग और संयम का पालन कर रहे किसी भी संत- महात्मा अथवा महापुरुष का अनादर नहीं करना चाहिए।

अनंत सागर

कहानी (तीसरा भाग)

17 मई 2020, उदयपुर

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