“सत्य और साधुत्व के परीक्षा की घड़ी”-अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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बीते कुछ रोज पहले ही कुछ श्रावकों, संस्थाओं और श्रेष्ठीगणों ने साधुओं के आहार, विहार और निहार की व्यवस्था को बनाने के लिए एक संस्था बनाने का निर्णय किया है। मुझे इस बात का हर्ष है कि आखिरकार साधुओं को लेकर हमारा श्रावक समाज जागरूक हुआ है। देखा जाए तो साधु और श्रावक धर्म रूपी रथ के दो पहिए हैं, जिसके माध्यम से ही धर्म की प्रभावना हो सकती है। लेकिन आज कुछ श्रावकों को लग रहा है कि कुछ साधुओं के चारित्र में गिरावट आ रही है। और मैं मानूंगा कि ऐसे कुछ उदाहरण सामने भी आए हैं। लेकिन मेरा सुझाव है कि साधु की चर्या पर नजर रखने वाली इस संस्था के गठन से पहले एक संस्था और बने। जिसमें भारतवर्ष के जितने भी जैन मंदिर हैं चाहे वह किसी छोटे से छोटे गांव में ही क्यों न हों, उनके समाज के अध्यक्ष और मंत्री को उस संस्था का सदस्य बनाया जाए। जो श्रावक साधुओं के संघ को चला रहे हैं, तन-मन और धन से योगदान दे रहे हैं, उन्हें भी विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में उस संस्था में रखा जाए। आज साधुओं पर तमाम आक्षेप लगाए जा रहे हैं। उनके परिग्रह की निंदा की जा रही है लेकिन जरा सोचिए इस परिग्रह की आवश्यकता किसी भी दिगंबर साधु को पड़ती ही क्यों है ? मेरा सुझाव है कि साधु समाज पर कोई भी आक्षेप लगाने से पहले श्रावक समाज यह निर्णय ले कि वह संतवाद और पंथवाद को छोडक़र साधु के आहार-विहार और निहार के लिए सदैव समर्पित रहेंगे, उनके प्रवचन को जन-जन को पहुंचाने का काम करेंगे। इसके साथ ही एक संकल्प यह भी होना चाहिए कि हम साधु समाज को ऐसी वस्तुओं का दान न करें, जिसके कारण साधु में चारित्रिक दोष उत्पन्न करने की गुंजाइश भी हों। अगर ये दो संकल्प श्रावक समाज पूरा कर ले तो साधु समाज अपने आप सुरक्षित रहेगा। उसका चरित्र भी दृढ़ हो जाएगा क्योंकि जिन साधनों के इस्तेमाल को लेकर साधुओं पर आरोप लगते हैं, वे साधन कहीं न कहीं श्रावक समाज के द्वारा ही आते हैं। हर साधु आहार, विहार और निहार के लिए श्रावक के अधीन है। इसी तरह से साधु के पास जो भी सामान आता है, वह श्रावक के जरिए ही आता है, अब सवाल यह है कि श्रावक देता ही क्यों है? इसके मायने यह हुए कि श्रावक ही आपस में बंटे हुए हैं। आज हर संस्था और श्रावक को यह सोचने की जरूरत है कि उसने कितना समय साधु के आहार और विहार में दिया है। कुछ नामी साधु को छोड़ दें तो जो छोटे साधु हैं, जिनकी साधना अच्छी है, उनका तप कठिन है, लेकिन उन्हें समाज से सहयोग न के बराबर मिलता है। श्रावक समाज ही साधुओं में भेदभाव कर रहा है, एक की व्यवस्था बहुत अच्छी करता है तो दूसरे को पूछता तक नहीं है। तो स्वाभाविक है कि समाज दो भागों में बंटेगा क्योंकि जिनकी व्यवस्था नहीं हो रही है, उनके भक्त समाज में द्वंद्व फैलाएंगे। ऐसे भी श्रावक हैं, जिन्होंने संत समाज के लिए कभी कुछ नहीं किया और साधुओं की चर्या पर अंगुली उठाने में सबसे आगे हैं। इसलिए साधुओं को कठोर होने से पहले श्रावकों को कठोर होना होगा। वे यह तय करें कि उन्हें साधु को क्या देना है और क्या नहीं। ये श्रावक ही हैं, जो पहले तो साधुओं को सुविधा प्रदान करते हैं और फिर उसी पर अंगुली उठाते हैं। साधु को दान ही देना है तो आहार दान,औषध दान, शास्त्र दान और अभय दान ही दें, जिनका उल्लेख हमारे शास्त्रों में किया गया है। ऐसा होते ही साधु समाज में जो दोष दिखाई दे रहे हैं, वे खुद-ब-खुद समाप्त हो जाएंगे। मेरा एक सुझाव और है कि शुुरुआत उन बड़े आचार्यों से करें, जिनका समाज में प्रभाव है, जिनका चारित्र दृढ़ है, जिनकी साधनाएं कठोर हैं। उन आचार्यों के पास बैठकर ये संस्थाएं संतवाद, पंथवाद और पंरपराओं को छोडक़र चर्चा करें। उन आचार्यों से दीक्षित साधु या शिष्य जहां-जहां भी आहार-विहार कर रहे हैं, उन सभी को वे पहले अपने संघ में बुलाएं। श्रावकों के ऊपर जब भी कोई बात आती है तो वह यही कहता है कि क्या करें, समय के अनुसार चलना पड़ता है। जिस काल में तुम दे रहे हो, उस काल में साधु भी दे रहा है। आज भी यही स्थिति है कि समाज साधु को चातुर्मास नहीं करा सकता है। शहर में भी एक मंदिर से दूसरे मंदिर जाने के लिए भी फोन करना पड़ता है। कई बड़े साधुओं के साथ भी यही समस्या है। मुझे ऐसी एक भी संस्था भी बता दें, जो एक फोन करते ही साधु के लिए सारी व्यवस्था कर दे। एक भी ऐसी संस्था जैन समाज में नहीं है। इसलिए पहले एक संस्था बनाएं और फिर उन साधुओं के पास जाएं और उनसे कहें कि उन्हें गाड़ी, नौकर, फोन या किसी भी अन्य भौतिक संसाधन को रखने की आवश्यकता नहीं है। संस्था आपकी पूरी व्यवस्था करेगी, बस आप किसी एक श्रावक से फोन करा दीजिए। ऐसा करते ही साधुओं का आधा परिग्रह कम हो जाएगा। ऐसी भी एक संस्था है नहीं और साधुओं को विहार करना पड़ता है। समाज उनके लिए कोई व्यवस्था नहीं करता और कहता है कि महाराज जी आप अपने हिसाब से कर लो तो साधु को परिग्रह करना ही पड़ता है। विहार में कितनी ही कठिनाइयां आती हैं। विहार में कभी समाज का कोई व्यक्ति साथ नहीं होता है ,तो साधु को कर्मचारी रखने पड़ते हैं, उन कर्मचारियों को वेतन भी देना होता है। हां, मैं इससे इनकार नहीं करूंगा कि साधु की चर्या पर समाज की नजर नहीं होनी चाहिए। संस्थाओं को तय करना होगा कि जिन साधुओं के चरित्र के बारे में शंकाएं है, उनके आचार्यो से पहले बात करेेंगे, घटना घटे नहीं, उससे पहले बात करेंगे। इसलिए संस्था के गठन के साथ ही पूरे देश भर में एक फोन नंबर जारी हो, जिस पर साधु फोन करवा सके कि उसे कहां कितने दिन रुकना है और फिर उसकी व्यवस्था हो जाए। इस संस्था का नाम ‘नमो लोए सव्व साहूणं संस्था’ रखा जा सकता है। संगोष्ठी हमेशा साधुओं पर हुई, श्रावकों पर नहीं। इसलिए धर्म के एक पहिए की बजाय दोनों पहिए सुधारे जाएं। पहले श्रावक समाज रूपी पहिए को सुधारें, उसके बाद ही जैन धर्म की प्रभावना अच्छी तरह से हो पाएगी।

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