श्रावक : शाश्वत सुख संयम से ही – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी

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भोगमरण का कारण है और पांचों इन्द्रियों भोग का कारण हैं। इस संबंध में एक प्रसंग पद्मपुराण के 5वें पर्व में मिलता है।

कथा इस प्रकार है-

राजा महारक्ष ने संकुचित कमल में एक मरा हुआ भौंरा देखा। पुण्य कर्म के उदय से राजा को यह ज्ञान हो गया कि भौंरा घ्राण और रसना इन्द्रियों के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गया है। मनुष्य तो पांचों इन्द्रिय में आसक्त रहता है… तो सोचने का विषय है कि हमारा क्या होगा। यह भौंरा तो तिर्यंच जाति का है, अज्ञानी है लेकिन हम मनुष्य तो ज्ञानी हैं। हममें सोचने-समझने की शक्ति है, फिर भी हम भोगों में आसक्त है। पांचों इन्द्रिय से जो सुख का अनुभव होता है वह तो सुख का आभास मात्र है जो आगे जाकर कर दु:ख देगा। वास्तव में इन्द्रियों से मिलने वाला सुख तो शहद में लिपटी तलवार की धार के समान है जिसे मुंह में लेंगे तो जीभ के दुकड़े हो जाएंगे। हम शहद देखकर खाने चले जाएंगे पर अंदर की तलवार की धार दिखाई नही देगी और शहद खाने के चक्कर मे जीभ कट जाएगी। यह होगा सिर्फ कुछ क्षण के शहद के स्वाद के चक्कर में।

यह सोचकर महारक्ष राजा के भाव वैराग्यमय हो गए। इस कथा से शिक्षा लेनी चाहिए कि इन्द्रियों से सुख नही मिल सकता है। जीवन में मनुष्य को शाश्वत सुख संयम से ही मिल सकता है, इसलिए संयम को धारण करना चाहिए।

अनंतसागर
श्रावक
इकचालीसवां भाग
10 फरवरी 2021, बुधवार, बांसवाड़ा

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