प्रेरणा : शत्रु से भी द्वेष मत रखिए – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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इतिहास साक्षी है कि जीवन को निर्मल और पवित्र धर्मग्रन्थ बनाते हैं । इन ग्रन्थों से प्रेरणा भी मिलती है और जीवन जीने की दृष्टि भी प्राप्त होती है। आज भी हम पद्मपुराण ग्रन्थ के पर्व 78 में वर्णित राम के जीवन से प्रेरणा लेने वाला प्रसंग पढ़ेंगे। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि शत्रु से भी द्वेष नहीं रखना चाहिए।

जब लक्ष्मण ने रावण को युद्ध में मार दिया तो उसके बाद राम ने कहा कि बुद्धिजीवियों का बैर (झगड़ा) तो मरण तक ही रहता है, इसलिए हम सब लोग चलें और लंकाधिपति रावण के शरीर का दाह संस्कार करवाएं। यह तय होने पर विभीषण, राम, लक्ष्मण सहित सभी राजा उस ओर गए जहां रावण का शव रखा हुआ था। यहां मन्दोदरी व अन्य स्त्रियां विलाप कर रहीं थीं। तब सभी स्त्रियों को राम ने संबोधित किया और फिर रावण के शरीर पर कपूर, अगुरु, गोशीर्ष और चन्दन आदि उत्तम पदार्थों का लेपकर पूरे संस्कारों के साथ रावण का अंतिम संस्कार किया।

इसके बाद सभी पद्म नाम के महासरोवर पर गए। यहाँ पर बैठकर राम ने कहा कि कुम्भकर्ण आदि को छोड़ दिया जाए। तब किसी ने कहा कि इन्हें नही छोड़ा जाना चाहिए, लेकिन राम ने कहा कि क्षत्रियों की नीति है कि सोते हुए को, बंधन में बंधे हुए, नम्रीभूत, भयभीत हुए, दांतों में तृण दबाये हुए आदि योद्धा मारने योग्य नहीं होते हैं।

इस तरह राम ने शत्रु होने के बाद भी रावण और उसके परिजनों से बैरभाव नहीं रखा।

अनंत सागर
प्रेरणा
चवालीसवां भाग
4 मार्च 2021, गुरुवार, भीलूड़ा (राजस्थान)

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