शत्रुघ्न ने निर्वाह किया श्रावक धर्म का – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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पद्मपुराण पर्व 89 में लिखा है कि युद्ध से पहले शत्रुघ्न ने श्रावक धर्म का निर्वाह करते हुए जिनेन्द्र भगवान की उपासना की और मां को प्रणाम किया।

शत्रुघ्न जब मधु से युद्ध के लिए जा रहे थे, सबसे पहले उन्होंने श्रावक धर्म का कर्तव्य निभाते हुए पंच परमेष्ठियों को नमस्कार कर उनका पूजन किया। उसके बाद भोजन आदि किया। माता का पैर छूकर उन्हें प्रणाम किया। मां ने कहा, तुम जल्द ही विजयी होकर वापस आओ, फिर जिनेन्द्र भगवान की सुवर्ण कमलों से पूजन करूंगी। स्वर्ग के इन्द्र आदि देव, जिन्हें नमस्कार करते हों, ऐसे जिनेन्द्र तेरे लिए मंगल प्रदान करें। जो आठ कर्मों से रहित हैं, सिद्धशिला पर विराजमान हैं वह सिद्ध भगवान तेरा कल्याण करें। इसके बाद राम-लक्ष्मण कुछ दूर तक भरत के साथ गए और फिर लक्ष्मण ने शत्रुघ्न को सागरावर्त नामक धनुष और वायु के समान वेगशाली अग्निमुख बाण सौॆप दिए। इसके बाद शत्रुघ्न सेना समेत युद्ध के लिए निकल गए। वह जिनेन्द्र भगवान और मां का आशीर्वाद लेकर निकले, यही तो श्रावक धर्म है। यही उच्चे कुल के श्रावक की पहचान है।

अनंत सागर
श्रावक
2 जून 2021,बुधवार
भीलूड़ा (राज.)

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