दिल की बात:-‘संसारी कार्यों को महत्व देना आंतरिक भावों को दूषित करता है’- अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

label_importantअंतर्मुखी के दिल की बात

आज अधिकांश श्रावकों के स्वभाव में साधुओं और धार्मिक कार्यों के प्रति कुछ अविनय का भाव का गया है। भाव सही है या गलत यह पूरा आलेख पढ़ने के बाद आप खुद ही तय कर लेना।
मंदिर में साधु संत आते हैं तो धार्मिक अनुष्ठान तो होते ही हैं। साधु ने आप को कह दिया कि भाई विधान कर लें या समाज के मुखिया से कह दिया कि आज महाराज साहब का विहार है साथ में जाना है, तो करीब करीब सभी श्रावकों का यही जवाब मिलता है कि अभी दुकान जाने का समय हो गया है, सीजन चल रहा है, तबियत ठीक नहीं है, देखता हूं और किसी से बात कर बताता हूं, एक काम करो पंडित को भेज दो, उसे पैसे दे देंगे या कोई आदमी कर दो वह चला जाएगा। किसी का जैसे तैसे मन बन भी गया तो कहता है चलो मैं आधी दूर तक चला जाता हूं फिर दूसरे को भेज देना। पर उसे कह देना वह अपना मोबाइल चालू रखे। कही बंद कर के नही बैठ जाए, नहीं तो मैं परेशान हो जाऊंगा।
सभी श्रावकों से लगभग ऐसे ही कुछ उत्तर सुनने मिलते हैं। अब दूसरी स्थिति की बात करते हैं। धर्म के काम में तो कई बहाने बन जाते हैं, लेकिन इसी समय परिवार में, दोस्तों के यहां कोई मांगलिक कार्य हो और जाना हो तो क्या कहते हो आप लोग….जाना होगा, व्यवहार निभाना पड़ता है, फिर अपने यहां काम होगा तो वह नहीं आएगा, समाज में रहना है तो सब एडजस्ट करना पड़ता है, पैसा तो फिर कमा लेंगे, किसी को बैठा दूँगा, किसी रिश्तेदार या मित्र को बुला लूंगा, वह दुकान चला जाएगा… तो मांगलिक कार्य में जाने के लिए ऐसी कुछ भी व्यवस्था कर लेते हो। वह अलग बात है कि वहां मन लग रहा है या नहीं?
दोनों स्थितियों में भाव का कितना अंतर आ जाता है। धार्मिक अनुष्ठान के लिए तो ना और सांसारिक काम के एडजस्ट कर लेते हैं…. यह समझना होगा कि धार्मिक अनुष्ठान से पुण्य और पहचान मिलती है और सांसारिक काम से कहीं ना कहीं पाप का बंध होता है। सुनने को मिलता है नास्तिक है। यह भी ध्यान रखना कि धन, जमीन, परिवार, सम्मान आदि संसारी सुख धार्मिक अनुष्ठान से ही मिलते हैं। धार्मिक कार्यों में रूचि नहीं होना और संसारी कार्यों को महत्व देना अंतरंग भावों दूषित करता हैं।
आप अब ही सोचिए कि परिवार, समाज को कुसंस्कारों से कैसे बचाएं। आज बच्चा न तो परिवार की सोचता है और ना समाज की। उसे जो अच्छा लगता है वही करता है। वह भी स्वतंत्रता के नाम पर। इसी कारण समाज, परिवार का अस्तित्व समाप्त होता जा रहा है। यह तय है कि समाज और परिवार के बिना स्वयं का अस्तित्व नही है और यह भी तय है कि समाज और परिवार का अस्तित्व धर्म से है। अब आप ही सोचिए कि आपको किस मानसिकता को महत्व देना है। विषय विचारणीय है……सबको मिल कर विचार करना चाहिए।

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