श्रावक को मोह करना ठीक नहीं – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

label_importantश्रावक

श्रावक (धर्मात्मा पुरुष) को किसी भी कार्य में मोह नहीं करना चाहिए। पद्मपुराण पर्व 91 में शत्रुघ्न को लेकर एक प्रसंग है जो हमें बताता है कि धर्मात्मा मनुष्य को अधिक प्रेम, मोह क्यों नहीं करना चाहिए?

मधुरा नगरी में यमुन देव नामक मनुष्य रहता था जो स्वभाव से क्रूर और धर्म के कार्यों से दूर रहता था। मरने के बाद वह सूकर,गधा,कौआ, बकरा, भैंसा हुआ। यह भैंसा पानी ढोने का काम करता था। यमुन का जीव छह बार तो भैंसा हुआ और पांच बार नीचकुल में निर्धन मनुष्य हुआ। उसने साधुसेवा और धर्म के कार्य किए जिसके प्रभाव से वह कुलन्धर नाम का ब्राह्मण हुआ। कुलन्धर बहुत सुंदर पर शील से रहित था। एक बार वहां का राजा विजय प्राप्त करने के लिए अन्य देश में गया। उसी दौरान रानी ललिता ने कुलन्धर को देखा। दोनों में आंखों ही आंखों में बात हुए और रानी ने उसे अपने महल में बुला लिया। उसे आसन पर बैठाया ही था कि इतने में राजा आ गया। रानी ने झूंठ बोलते हुए सारी गलती कुलन्धर की बता दी। राजा के कहने पर सैनिकों ने कुलन्धर ब्राह्मण को पकड़ लिया और उसे जंगल  में ले गए। जंगल में कल्याण नामक साधु ने उसे देखा जिनकी सेवा कई बार कुलन्धर ने की थी। मुनि ने कुलन्धर से कहा, अगर तुम दीक्षा लेते हो तो मैं तुझे अभी रिहा कराता हूं। कुलन्धर ने दीक्षा लेना स्वीकार कर लिया। मुनि ने राजा के सैनिकों से कुलन्धर को छुड़वा लिया। अब वह कुलन्धर मुनि हो गया। वह अच्छे भाव के साथ उत्तम तप करने लगा और तप के प्रभाव से समाधि मरण कर सौधर्म स्वर्ग में ऋतुविमान में देव हुआ। ऋतुविमान से च्युत होकर राजा चन्द्रभद्र की दूसरी रानी कनकप्रभा के गर्भ से अचल नामक पुत्र हुआ। पर, यहां पर किसी कारणवश वह राज्य से निकल गया। अपनी बुद्धि, शक्ति के प्रभाव के चलते कौशाम्बी नगरी के राजा के बेटी इंद्रदत्ता से उसका विवाह हो गया और वह वहां का राजा बन गया। वह मधुरा आया और वहां का राज्य प्राप्त किया। फिर यहां पर यश:समुद्र नामक आचार्य से दीक्षा धारणकर तप-साधना के साथ समाधिमरण कर वह स्वर्ग में देवेंद्र हुआ। वहां से च्युत होकर वह शत्रुघ्न बना। पूर्व भव में उसने मधुरा नगरी में जन्म लिया था। उसी मोह से उसका मधुरा के प्रति अधिक प्रेम और लगाव है।

अनंत सागर
श्रावक
9 जून 2021, बुधवार
भीलूड़ा (राज.)

Related Posts

Menu