श्रावक : -पाप कर्म की निर्जरा के लिए करें प्रतिक्रमण-अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज

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परमात्मा और परमात्मा के उपदेश को मानने वाले मनुष्य को धर्म शास्त्रों में श्रावक शब्द से संबोधित किया गया है। श्रावक संत नही गृहस्थ होता है। वह गृहस्थ धर्म के सम्पूर्ण कार्य कर सकता है। मनुष्य श्रावक बन कर अपने अंदर की मानवता को बढ़ाने का संकल्प करता है। मनुष्य पर्याय में जन्म लेने वाला हर मनुष्य श्रावक बन जाए यह जरूरी नहीं है। हम कहते हैं ना कि मनुष्य पर्याय में राक्षस पैदा हो गया। इसका मतलब यही है कि उस मनुष्य के अंदर श्रावक के संस्कार नही हैं। जो मनुष्य संस्कारों के माध्यम से श्रावक बनता है, उसके वह संस्कार बने रहें और संस्कार वृद्धि को प्राप्त होते रहें उसके लिए धर्म शास्त्रों में अनेक नियम, आचरण, त्याग आदि क्रिया का वर्णन मिलता है। ग्रहस्थ धर्म का पालन करते हुए त्याग, आचरण, नियम और संस्कारों में अनजाने में काल आदि के प्रभाव से दोष लग ही जाते हैं। उन दोषों का निराकरण प्रतिक्रमण के माध्यम से किया जाता है।
प्रतिक्रम के स्वरूप के बारे में गोम्मटसार जीवकाण्ड में कहा है कि-
प्रतिक्रम्यते प्रमादकृत दैवसिकादिदोषों निराक्रियते अनेनेति प्रतिक्रमण।
अर्थात् – प्रमाद के द्वारा किये दोषों का जिसके द्वारा निराकरण किया जाता है, उसको प्रतिक्रमण कहते हैं।
कहने का तात्पर्य है कि श्रावक अपने गृहस्थ के कर्त्तव्यों का पालन करने के लिए और जीवनयापन के लिए व्यापार, नौकरी आदि कार्य करता है। इसके अलावा धर्म ध्यान करने के लिए भोजन आदि की आवश्यकता होती है। इन सब क्रियाओं में सावधनी रखते हुए भी अनेक जीवों की हिंसा नही चाहकर कर भी अनजाने में हो जाती है। गृहस्थ के द्वारा इन सब कार्यों में अनजाने में एक इन्द्रिय पेड़-पौधौ से लेकर पंचेन्द्रिय पशु-पक्षी, मनुष्य आदि की हिंसा मन, वचन, काय से हो जाती है। भगवान की भक्ति में प्रमाद आ जाने के कारण, भगवान के कहे वचनों का अनजाने में अनादर करने पर, देव पूजा, गुरु आराधन, स्वाध्याय, सयंम, तप, दान आदि करते समय अनजाने में, हमारे साथ रहने वाले मनुष्य मात्र के अवगुणों को दूसरों को बताना एवं अपने अवगुणों को छुपाना, दूसरों की निंदा करना, अपनी प्रसंशा करना आदि में मन, वचन, काय से जो दोष हो जाते हैं, गृहस्थ प्रतिक्रमण कर उन दोषों का निराकरण करता है। प्रतिक्रमण में वह अपने आप को पापी स्वीकार करता है जिससे उसके अंदर दया, करुणा, आत्म ग्लानि का भाव अपने आप आ जाता है। यही भाव पापों के नाश का कारण है। प्रतिक्रमण कम से कम दिन में एक बार अवश्य करना चाहिए। शास्त्रों में श्रावक के लिए कई प्रकार के प्रतिक्रमण मिलते हैं। पाठों में एक आलोचना पाठ है जिसका पाठ करने से भी दोषों का निराकरण हो जाता है। आलोचना पाठ श्रावक के लिए लघु प्रतिक्रमण के समान ही है। संतो के लिए 2 बार प्रतिक्रमण करने का विधान शास्त्रों में है। इसका स्वरूप भी अलग है।

अनंत सागर
श्रावक
(चौबीसवां भाग)
14 अक्टूबर, 2020, बुधवार, लोहारिया
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज
(शिष्य : आचार्य श्री अनुभव सागर जी)

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