श्रवण की संगति से कर्म बदला – अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज

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पद्मपुराण के पर्व 22 में एक कथा है, जो कर्म के फलों को बताती है। कथा यह बताती है कि मनुष्य के अंदर कब अधर्म का और धर्म करने का भाव बन जाता है और श्रवण के उपदेश से श्रवण बन जाता है।

सौदास नाम का राजा हुआ। उसे बालक के मांस खाने की आदत हो गई। जब धीरे-धीरे नगर में बालक कम होने लगे तो लोगों ने पता किया की यह क्या हो रहा है! तब यह बात मालूम हुई कि राजा सौदास ही बालक का मांस खाता है। प्रजा ने राजा सौदास और रसोइया को राज्य से निकाल दिया। राज्य से निकलने के बाद भी वह बालक का मांस खाने की आदत से लाचार था। वह श्मशान में जाकर मृत बालक के मांस का भक्षण करता था। ठीक उसी तरह जैसे सिंह मनुष्य का भक्षण करता है। इसलिए उनका नाम सिंहसौदास पढ़ गया।

बालक का मांस खाने के लिए वह इधर-उधर भटकता रहता था। इस दौरान एक दिन उसे दिगम्बर श्रवण के दर्शन हुए, उसने श्रवण का उपदेश सुना और उसके भाव परिवर्तित हो गए। उसने श्रावक के व्रतों को धारण किया। श्रवण उपदेश और व्रतों के प्रभाव से वह महापुर का राजा बन गया।

राजा बनने के बाद अपने सगे बेटे से उसका युद्ध हुआ, जिसमें वह विजय हुआ। विजय होने के बाद दोनों राज्य का राजा अपने बेटे को बनाकर वह श्रवण बन गया। इस कथा से शिक्षा लेना चाहिए कि जीवन उन्नति श्रवण की संगति से ही सम्भव है। श्रवण की संगति से राजा पद और श्रवण पद दोनों मिला।

शब्दार्थ

श्रवण- जैन मुनि, भक्षण- खाना, उपदेश- प्रवचन, श्रावक- श्रद्धावान मनुष्य।

अनंतसागर
कर्म सिद्धांत
उनचालीसवां भाग
26 जनवरी 2021, मंगलवार, बांसवाड़ा

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