श्रावक का मुख्य कर्तव्य दान और पूजा-अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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उदयपुर। दिगम्बर जैन मंदिर, पहाड़ा में चल रहे सिद्धचक्र मंडल विधान के नवें दिन विधान के समापन पर मंत्रों सहित आहूति दी गई।विधान के अंतिम दिन अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज की बडी धूमधाम से संगीतमय पूजा की गई। इस अवसर पर सौधर्म इन्द्र बनने का लाभ महावीर प्रसाद, पलावत मनोहर और यज्ञनायक बनने का लाभ प्रकाश डूंगरिया को प्राप्त हुआ। पंचामृत और शांतिधारा करने का लाभ गजेंद्र जेवरिया, कन्हैयालाल जावरिया, प्रकाश अदवासीया, रमेश चिबोडिया को प्राप्त हुआ।अंतिम दिन 3 बड़े हवन और 9 छोटे हवन में सिद्धचक्र विधान के मंत्रों के अनेक हवन किये गए। हवन के समय पर दो मुख्य कलश और अन्य  21 कलश की स्थापना की गई, जो अलग अलग श्रावकों को दिए गए।

कार्यक्रम में अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि श्रावक का मुख्य कर्तव्य दान और पूजा है। जो दान और पूजा नहीं करता, वह श्रावक होते हुए भी तिर्यंच(दानव) के समान है। संसार में दान ही एक ऐसा माध्यम है, जिससे लेने और देने वाले, दोनों को ही पुण्य प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि जिस धन का उपयोग धर्म के लिए होता है, वह धन चार गुना पुण्य के रूप में वापस आता है। यहां तक कि दान की अनुमोदना करने वाला पशु भी भोग भूमि में जन्म लेता है। मुनि श्री ने कहा कि जो व्यक्ति साधना और धर्म प्रभावना में अपने धन का उपयोग करता है, उसे साधु की साधना का सात प्रतिशत पुण्य के रूप में प्राप्त होता है। उन्होंने बताया कि भगवान महावीर ने जो अपरिग्रह का सिद्धांत दिया है, वह दान के लिए ही दिया है। 

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