अपने आत्मिक सुख के साथ व्यावहारिक सुख को नष्ट कर लेता है कषाय करने वाला व्यक्ति – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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उदयपुर। पद्मप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर पहाड़ा, उदयपुर में अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के सानिध्य में चल रहे सिद्धचक्र मंडल विधान के चौथे दिन श्रावक अष्ट द्रव्य की सुंदर-सुंदर थाली सजाकर लेकर आए और फिर उसी से सिद्ध भगवान की पूजन की। इस अवसर पर अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि कषाय जीवन को कस देती है।

कषाय करने वाला व्यक्ति अपने आत्मिक सुख के साथ व्यावहारिक सुख को नष्ट कर लेता है। दूसरों के बारे में सोचने से ही कषाय होती है। संसार में व्यक्ति का व्यवहार बिगड़ता है तो वह कषाय से ही बिगड़ता है।

कषाय के साथ गलत धारण, प्रमाद, अव्रत, मन, वचन और काय की चंचलता होते ही व्यक्ति को अशुभ कर्म का बंध होता है। जितनी अधिक कषाय होगी, उतना अधिक अशुभ कर्म का बंध होता है। कषाय 25 प्रकार की होती है।

आप जो भी काम करो, वह कषाय से रहित होकर करो। धर्म क्षेत्र में कषाय करने से हजारों गुना अधिक अशुभ कर्म का बंध होता है। हम आज जिनकी पूजा कर रहे हैं, वह कषाय रहित हो गए हैं। उनका शरीर भी नहीं हैं इसलिए तो उन्हें सिद्ध भगवान कहते हैं।

इससे पहले विधान के चौथे मंडल पर 128 अर्घ्य कषाय रहित सिद्ध भगवान को समर्पित किए गए। मुनि श्री ने स्वयं श्रावकों के साथ अर्घ्य चढ़ाए।

इस दिन विधान में मुख्य सौधर्म इन्द्र बनने का लाभ कांतिलाल कोठारी, यज्ञनायक बनने का लाभ पवन पद्मावत को मिला। जिनेन्द्र भगवान का पंचामृत अभिषेक और शांतिधारा करने का लाभ प्रकाश गुडलिया, प्रकाश झगड़ावत, डॉ. राजमल जैन, अजित तितड़िया को प्राप्त हुआ। शाम को सिद्धचक्र मंडल की आरती और मुनि श्री द्वारा ऋषिमंडल स्तोत्र का अर्थ करवाया गया। 

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