सीता का निर्वासन – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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पद्मपुराण पर्व 97 में सीता को जंगल में भेजने को लेकर राम और लक्ष्मण आपस में चर्चा करते हैं। आइए, जानते हैं उस चर्चा के बिन्दु…

राम ने लक्ष्मण आदि राजाओं को बुलाया और कहा-हमारा वंश भगवान आदिनाथ का वंश है जो निर्मल और पवित्र है। इसी वंश में सीता पर अवर्णवाद लगा है कि वह रावण के यहां रहकर आई है तो पवित्र कैसे हो सकती है? मैं जानता हूं कि सीता सती और शुद्ध हैं, पर यह अवर्णवाद न तो शास्त्रों और न ही शस्त्रों से दूर किया जा सकता। यह सुनकर लक्ष्मण क्रोधित हो गए और बोले-कहा हैं अवर्णवाद, किसने लगाया है उसे में मृत्यु को प्राप्त करवाता हूं। राम ने कहा, तुम शांत हो जाओ। मैं सीता को छोड़ सकता हूं पर वंश की कीर्ति को नष्ट नहीं होने दूंगा। लक्ष्मण फिर राम से कहते हैं कि भाई, तुम लोकापवाद के भय से सीता को क्यों छोड़ रहे हो। साधारण मनुष्य के कहने से विद्वज्जन क्षोभ को प्राप्त नहीं होते हैं क्योंकि कुत्तों के भौंकने से हाथी लज्जा को प्राप्त नहीं होता है। चुगली करने में तत्पर और दूसरे के गुणों को सहन नहीं करने वाला दुष्कर्मा दुष्ट मनुष्य निश्चित ही दुर्गति को प्राप्त होता है। इस पर राम कहते हैं- लक्ष्मण, तुम सत्य कह रहे हो परन्तु लोक विरुद्ध कार्य भी शोभा नहीं देता है। राम ने लक्ष्मण से कहा कि अब तुम्हें और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। मैंने जो निश्चय किया है वह अवश्य किया जाएगा। निर्जन वन में सीता अकेली छोड़ी जाएंगी। वहां वह अपने कर्म से जीवित रहे अथवा मरे। सीता इस देश में, किसी उत्तम सम्बंधी के नगर में अथवा किसी घर में क्षणभर के लिए निवास न करें। राम ने कृतान्तवक्त्र सेनापति को बुलाया और आदेश दिया कि जिनमंदिर, तीर्थयात्रा के निमित सीता की ले जाकर सिंहनाद नामक जंगल में छोड़ दो और तुम शीघ्र ही वापस आ जाओ।

शिक्षा –मिथ्यापवाद के भय से राम ने सीता को जंगल में छुड़वा दिया। राजाओं के लिए यह दृष्टान्त मार्गदर्शक है कि कर्तव्यपालन में कुछ भी आड़े नहीं आने देना चाहिए चाहे कितना ही कोई अपना प्रिय क्यों न हो।

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